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प्रो. के.टी. शाहः श्रीमन्, हम संशोधन को नहीं अपनाते। क्या आप हमें कुछ स्पष्टीकरण देंगे? क्या शासक उम्मीदवार होने जा रहे हैं और क्या उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता से छूट दी जाएगी?
डॉ. अम्बेडकरः स्थिति यह है कि जैसा कि सदन को याद होगा कि जब चयन समिति की रिपोर्ट पर चर्चा की गई थी, यह सुझाव दिया गया था कि शासन करने वाले शासकों को विधानमंडल के सदस्य होने से निरर्हित किया जाना चाहिए। विभिन्न आधार बताए गए थे। उनमें से एक आधार यह था कि वे ऐसे वचनपत्र के आधार पर जो भारत सरकार के साथ था और जिसके अधीन भारत सरकार उन्हें हर वर्ष कतिपय राशि देने के लिए सहमत थी, भारत सरकार के अधीन एक प्रकार का लाभ का पद धारण कर रहे थे। तब मैंने कहा था कि मुझे यह नहीं लगता कि यह लाभ का पद है, अतः, यह संविधान के उस अनुच्छेद के उपबंधों के अधीन नहीं आ सकता, जो लाभ के पद धारकों के बारे में है। मैंने उस समय कहा था, जब मामले पर चर्चा की गई थी, कि मुझे कोई विधिमान्य औचित्य नहीं मिलता कि क्यों शासन करने वाले शासकों को विधानमंडल का सदस्य बनने से निरर्हित किया जाए। तत्पश्चात् यह आग्रह किया गया था कि इन शासन करने वाले शासकों को दंड प्रक्रिया संहिता और सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन कतिपय संरक्षण दिए गए थे जिसके आधार पर किसी व्यक्ति के लिए भारत सरकार की पूर्व अनुमति के बिना उनके विरुद्ध दांडिक परिवाद फाइल करना या सिविल वाद लाना संभव नहीं था। इस आधार पर यह कहा गया कि यदि इस संरक्षण का विस्तार नामांकन और मतदान की मध्यवर्ती अवधि के बीच किया जाता है, तो शासक कोई अपराध कर सकता है या वह कोई भ्रष्ट व्यवहार या अवैध व्यवहार कर सकता है और किसी व्यक्ति के लिए उसके विरुद्ध आरोप दर्ज कराना संभव नहीं होगा क्योंकि भारत सरकार की अनुज्ञा आवश्यक है। मैंने महसूस किया कि यह एक विधिसम्मत परिवाद थाµयदि कोई शासक निर्वाचन में खड़ा होना चाहता है तो उसे उस संरक्षण का दावा करने की अनुज्ञा नहीं दी जानी चाहिए जो उसे दंड प्रक्रिया संहिता और सिविल प्रक्रिया संहिता के उपबंधों द्वारा दी गई है।
अतः इस संशोधन में जो प्रस्तावित है, यह है कि यदि कोई शासक निर्वाचन, चाहे यह संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र का निर्वाचन हो या राज्य विधानसभा का निर्वाचन हो, के लिए उम्मीदवार के रूप में खड़ा होता है, तो वह स्वतः दंड प्रक्रिया संहिता और सिविल प्रक्रिया संहिता में अंतर्विष्ट उपबंधों द्वारा उसे प्रदत्त फायदों को अभिप्राप्त नहीं कर पाएगा, ताकि उसे भारत सरकार की मंजूरी के बिना किसी अपराध के लिए अभियोजित किया जा सके। भारत सरकार की सहमति के बिना उसके विरुद्ध निर्वाचन अर्जी फाइल की जा सके और कोई अन्य कार्यवाही उसके विरुद्ध आरंभ की जा सके मानों कोई विशेष विशेषाधिकार न रखने वाला वह आम नागरिक हो। मैं सोचता हूँ कि यह चयन समिति