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श्री कामथः यह इंग्लैंड में है।
डॉ. अम्बेडकरः यह सही है कि यह इंग्लैंड में है, किन्तु मैं सोचता हूँ कि इस पर विचार करने के लिए बहुत निरापद से इसे हम अपने निर्वाचकगण पर छोड़ दें क्योंकि यह संसद गूंगों, बहरों और अपंगों से गठित नहीं है और यहाँ ऐसे लोग ही हैं जो शारीरिक रूप से सुनने, बोलने और चलने के योग्य हैं।
कुछ सदस्यों ने कहा है कि हमने अपने निरर्हता खंड में चोरबाजारियों और ऐसे अन्य व्यक्तियों को सम्मिलित नहीं किया है। मैं सोचता हूँ कि प्रो. के.टी. शाह द्वारा यह मुद्दा उठाया गया था। उन सभी विषयों के संबंध में मैं यह कहना चाहता हूं कि विधि बनाने के लिए किसी आदर्श को अपनाना ही पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी बहुत आवश्यक है कि आदर्श व्यावहारिक भी। और मैं यह नहीं सोचता कि मेरे मित्र प्रो. के.टी. शाह ने कुछ आदर्शवादी सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए व्यावहारिक पक्ष की ओर अपने विवेक का प्रयोग किया, तो उन्होंने इस खंड की बाबत प्रतिपादित किए हैं।
दूसरा मुद्दा कतिपय अपराधों के लिए पारित दंडादेशों से उद्भूत निरर्हताओं के संबंध में था। उसके संबंध में तीन भिन्न-भिन्न स्थितियों पर विचार करना संभव है। एक स्थिति यह है कि किसी अपराध के लिए दंड स्वतः पर्याप्त होता है और संसद के किसी सदस्य के रूप में खड़े होने के लिए इसे किसी अतिरिक्त निरर्हता के रूप में शामिल नहीं करना चाहिए। मैं सोचता हूँ कि यह एक मत है जो स्वीकार किया जा सकता है। दूसरा मत जो स्वीकार किया जा सकता है, यह है कि दंड के साथ नहीं, बल्कि अपराध की प्रकृति के साथ निरर्हता संबद्ध करनी चाहिए, चाहे इसमें नैतिक अधमता अंतर्वलित हो या नैतिक अधमता अंतर्वलित न हो। यह दूसरा मत है जिसे कोई स्वीकार कर सकता है। तीसरे मत को इस विधेयक में लिया ही गया है। इस मत को उस समय से इस देश में स्वीकार किया गया है जब से निर्वाचन आरंभ हुए थे। मैं ऐसी कोई अवधि नहीं जानता, जब से हमारी विधि में यह उपबंध है, अर्थात् यद्यपि किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया और कतिपय अवधि के कारावास से दंडादिष्ट किया गया हो फिर भी वह किसी निरर्हता से ग्रस्त नहीं होगा।
गलत या सही, यही विधि है जिसे हमने शुरू से आज तक अपनाया है। परिणामतः जहां तक विधेयक का संबंध है, कोई विपथन नहीं किया गया है। हम ऐसी कोई बात सम्मिलित नहीं कर रहे हैं जो नई हो। हम मात्र ऐसी बातें स्वीकार कर रहे हैं तो पहले से ही अस्तित्व में हैं।
सरदार सोचेत सिंहः 50,000/- रु. जैसे भारी जुर्माने के बारे में क्या स्थिति है?
डॉ. देशमुखः श्रीमन्, मैं जानना चाहता हूं कि किस उपबंध के अधीन अनेक कांग्रेसी लोग, जो कारागार बए थे और दोषसिद्ध हुए थे, निर्वाचन में खड़े होने में समर्थ हुए और कैसे उनकी निरर्हता हटाई गई?