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द्वारा अपने अधिवक्ता के रूप में लगाया गया है, विधानमंडल का सदस्य होने से निरर्हित नहीं किया जाना चाहिए। जैसा कि यहां हमारे एक मित्र ने एक मामला निर्दिष्ट किया है, कि ऐसा अधिवक्ता जो सरकारी प्लीडर है, काफी पहले लाभ का पद धारण करने वाला व्यक्ति किया गया है। मुझे लगता है कि इससे मामले का अंत हो गया और हम संविधान के अनुच्छेद 102 में अंतर्विष्ट उपबंधों के होते हुए भी निरर्हता हटाना चाहते हैं, तो यह कहने का कुछ अच्छा आधार होना चाहिए कि सरकारी प्लीडर को अपवर्जित किया जाए। मैं नहीं समझता कि मेरे माननीय मित्र श्री रोहिणी कुमार चौधरी ने कोई और तर्क जोड़ा है। मैं विश्वास करता हूं कि उन्होंने केवल अधिवक्ताओं में मेरी सहानुभूति और मेरे पेशेवर हित के बारे में अपील की है, (व्यवधान)। पर, मैं अपने पेशे की सहायता के प्रयोजन के लिए, किसी प्रकार का अविवेक या अवैधता करने नहीं जा रहा हूँ।
दूसरा प्रश्न मेरे माननीय मित्र श्री खंडूभाई देसाई द्वारा उठाया गया है। मुझे यह कहना है कि उनकी शिकायत से मुझे आश्चर्य हुआ। उनकी शिकायत है कि कई अधिवक्ता सासंद हैं, जो अपने मुवक्किलों के लिए सरकार के विभिन्न सदस्यों के समक्ष उपस्थित होते हैं और फीस वसूल करते हैं और यह स्थानीय विधानमंडलों में भी होता है। मेरा यह कहना है कि मैं इस पर पूरी तरह से अचम्भित हो गया क्योंकि अधिवक्ता को न्यायालय में प्रैक्टिस करने का अधिकार है और मैं नहीं जानता कि क्या ऐसी कोई विधि है जो यह उल्लेख करती है कि किसी विभाग का प्रशासन करने वाला कोई मंत्री एक न्यायालय है। अतः कोई अधिवक्ता सांविधानिक अधिकार का प्रयोग करने पर बल नहीं दे सकता, जो उसे अपने पेशे की प्रैक्टिस करने में मंत्री के समक्ष जाने और सुनवाई करने के लिए दिया गया है। यदि भारत सरकार का कोई मंत्रीµवे मुझे माफ करेंµअधिवक्ता को अपने समक्ष उपस्थित होने की अनुज्ञा दे रहा है तो मुझे यह लगता है कि वह विधि के उपबंधों के प्रतिकूल कार्य कर रहा है। यदि हमारे मंत्रियों को इस सामान्य नियम का पालन करना है कि वे न्यायालय नहीं हैं अतः वे किसी अधिवक्ता की सुनवाई नहीं करेंगे तो मैं सोचता हूं कि ऐसा आचरण जो मेरे माननीय मित्र श्री खंडूभाई देसाई द्वारा निर्दिष्ट किया गया है, पूर्णतः समाप्त हो जाएगा।
माननीय अध्यक्षः क्या ऐसा कोई आचरण है?
प्रधानमंत्री (श्री जवाहरलाल नेहरू)ः मैंने ऐसे आचरण या किस दृष्टांत के बारे में कभी नहीं सुना है। मैं यह जानना चाहूंगा कि यह कहां हुआ और कब हुआ।
डॉ. अम्बेडकरः मैं नहीं जानता। यह वही कथन है, जो श्री खंडूभाई देसाई ने किया है।
निर्माण, उत्पादन और आपूर्ति मंत्री (श्री गाडगिल)ः दूसरी ओर, शिकायत यह है कि हममें से कुछ ने अधिवक्ताओं से भेंट करने से इनकार किया।