608 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित संशोधन में, खंड 122 के भाग 8 के प्रस्तावित स्पष्टीकरण के भाग (ख) में फ्पाटिल, ग्राम मुखिया या कोई अन्य ग्राम अधिकारीय् शब्दों को लोप करें।
श्री कॉमथः समेकित सूची सं. 2 की पूरक सूची सं. 3 में मेरा संशोधन है। मैंने कई संशोधन उपलब्ध कराए हैं किन्तु मैं उनमें से केवल एक का ही प्रस्ताव लाऊंगा। समेकित सूची सं. 2 की पूरक सूची सं. 6 से भी मैं संशोधनों में से एक ही संशोधन ला रहा हूं। और समेकित सूची सं. 2 की पूरक सूची सं. 6 में मेरे कई संशोधन हैं, किन्तु, मैं केवल एक ही संशोधन ला रहा हूं। शेष संशोधन मैं नहीं ला रहा हूं। अर्थात् मैं समेकित सूची सं. 2 की पूरक सूची सं. 3 का संशोधन सं. 5, समेकित सूची सं. 2 की पूरक सूची सं. 4 का संशोधन सं. 3 और समेकित सूची सं. 2 की पूरक सूची सं. 6 का संशोधन सं. 2 का प्रस्ताव प्रस्तुत करूंगा।
मैं सर्वप्रथम पूरक सूची सं. 3 के संशोधन सं. 5 को लूंगा। मैं प्रस्ताव पेश करने की अनुमति चाहता हूँः
( i ) खंड 122 के भाग (2) के परंतुक के भाग (क) ( ii ) में, फ्दैनिक असंतोष
या आध्यात्मिक निन्दा का उद्देश्यय् शब्दों के स्थान पर फ्दैनिक अभिशाप का
शिकार व्यक्तिय् शब्द रखें।
डॉ. अम्बेडकरः मैं दोनों के बीच का अंत नहीं समझ पा रहा हूं।
श्री कॉमथः श्रीमन्, अब मैं यह उल्लेख करना चाहता हूँ कि स्पष्टतया यह आंग्ल विधि और संभवतः भारतीय दंड संहिता से लिया गया है जिसने भी इसे मूलतः आंग्ल विधि से उधार लिया था। किन्तु आंग्ल विधि में प्रयोग किए गए शब्द फ्आध्यात्मिक असम्यक असरय् हैं, और वहां यह स्पष्ट है क्योंकि ईसाई धर्म में फ्आध्यात्मिक निन्दाय् या फ्आध्यात्मिक क्षतिय् का निश्चित अभिप्राय है। इस फ्आध्यात्मिक असम्यक असरय् के संबंध में इंग्लैंड में यह अभिनिर्धिरित किया गयाµजहां कुछ रोमन कैथोलिक पादरियों से धर्म मंत्री के रूप में अपने धार्मिक कर्तव्यों से असंगत रीति से मतदाताओं पर अपने धार्मिक प्रभाव का प्रयोग कियाµजिसे फ्असम्यक असरय् अभिनिर्धारित किया गया। फ्पादरी नैतिक कर्तव्य की सही बातों पर परामर्श दे सकता है, सलाह दे सकता है, सिफारिश कर सकता है और इंगित कर सकता है। उम्मीदवार के बारे में राय दे सकता है, किन्तु वह लोगों को ऐसे अंधविश्वास जिन पर उसका विश्वास है, के संबंध में अपील नहीं कर सकता।य् श्रीमन्, यह भारत है। मैं स्वयं भी बिल्कुल आश्वस्त नहीं हूं.........
श्री जवाहरलाल नेहरूः मैं व्यवधान नहीं डालना चाहता, किन्तु मैं जो इस सदन में हो रहा है उसको अपनाने में बिल्कुल असमर्थ हूं। मैं इसका महत्व नहीं समझ पा रहा हूं।
ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 28 मई, 1951, पृष्ठ 9582-83