614 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पंडित कुंजरुः मैं यह निवेदन कर रहा था कि डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित संशोधन बहुत गंभीर प्रकृति का है और हमें निपक्षतः इस पर पूरी तरह से विचार करने और इसके बारे में संशोधन प्रस्तावित करने का समय दिया जाना चाहिए। संशोधन को पढ़ने मात्र से यह दर्शित होता है कि इसका विधेयक के कई उपबंधों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा और विभिन्न दलों के उम्मीदवारों के बीच संतुलन को गंभीर रूप से परिवर्तित करेगा। अतः, मेरा सुझाव है कि हमें इस संशोधन पर विचार करने का समय दिया जाना चाहिए। कुल मिलाकर, केवल यह खंड है जो पारित नहीं किया गया है और इससे कुछ नुकसान नहीं होगा, फायदा ही फायदा होगा। मैं सोचता हूं कि क्या हमें इस संशोधन पर विचार करने और संशोधन प्रस्तावित करने के लिए अधिक समय नहीं दिया जा सकता।
डॉ. अम्बेडकरः स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है। यहां ऐसा कुछ नहीं है जिससे कोई संदेह पैदा करने की आवश्यकता हो। वस्तुतः, कुछ लोगों को संदेह था कि किस प्रकार के व्यय को निर्वाचन-व्यय में सम्मिलित किया जा सकता है और यह इस तरह का उपबंध है कि मैं उनके संदेहों को दूर करने के लिए सोचने हेतु समर्थ हुआ। यदि मेरे मित्र कोई अन्य सुझाव देना चाहते हैं, तो मैं सुनना चाहूंगा।
माननीय अध्यक्षः श्री कॉमथ के संशोधन के बारे में क्या कहना है?
डॉ. अम्बेडकरः फ्किसी भवन काय् शब्दों के बारे में किसी संदेह की आवश्यकता नहीं है। शब्दों का लोप किए जाने की भी आवश्यकता नहीं है। विषय के बारे में कतई कोई संदेह नहीं है।
श्री कॉमथः इस मुद्दे पर पूरी चर्चा नहीं हुई थी, और इसे अंतिम क्षण में ही जोड़ा गया था।
श्री आर.के. चौधरीः श्रीमन्, खंड 124 के उप-खंड (3) को निकालने के लिए मैं अपना संशोधन सं. 153 लाना चाहता हूं।
माननीय अध्यक्षः वह इसे ला सकते हैं।
श्री संथानमः इसे पृथक्-पृथक् रखा जाए। इसे पेश करने और भाषण देने के बजाय भाग 3 को पृथकतः रखा जाए।
डॉ. अम्बेडकरः मेरा संशोधन लाया जाए।
माननीय अध्यक्षः मतदान के समय मैं इस पर विचार कर लूँगा।
श्री आर.के. चौधरीः मैं प्रस्ताव पेश करने की अनुमति चाहता हूँः
फ्खंड 124 के भाग 3 का लोप करें।य्