618 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री इथिराजुलु नायडुः मैं खंड 59 का उल्लेख करना चाहता हूं जो इस विशिष्ट मामले में बारे में है। क्या विधि मंत्री खंड 59 में संशोधन करने की उपादेयता पर विचार करेंगे? वह खंड फ्व्यक्तियों के कतिपय वर्गों द्वारा मत देने की विशेष प्रक्रियाय् को निर्दिष्ट करता है।
डॉ. अम्बेडकरः नहीं, वह देश के बाहर रहने वाले लोगों के लिए एक बिल्कुल पृथक खंड है।
श्री कॉमथः संसद के समक्ष रखे जाने वाले नियमों के संबंध में मेरे द्वारा लाए गए संशोधन का उत्तर अभी दिया जाना बाकी है।
डॉ. अम्बेडकरः उसके संबंध में स्थिति यह है। जैसा कि सदन का प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि हम नवम्बर-दिसंबर में निर्वाचन कराने के लिए अपने स्तर पर सर्वोत्तम प्रयास कर रहे हैं। अब, यदि मेरे माननीय मित्र श्री कॉमथ द्वारा सुनाई गई इस प्रक्रिया को अंगीकार किया जाता है कि नियम संसद के सदन के पटल पर रखे जाएँगे और उनमें प्रवर्तनशील बल नहीं होगा, वह अंगीकृत है, संसद उसे अनुमोदित न करे वह बिल्कुल स्पष्ट है कि हम उस प्रयोजन को प्राप्त करने के योग्य नहीं हो सकेंगे जो हमारी दृष्टि में है अर्थात् यह कि निर्वाचन, नवम्बर-दिसम्बर में हो जाना चाहिए। अकेले इस आधार पर उस संशोधन को स्वीकार करना मुझे कठिन लगता है जो उन्होंने प्रस्तुत किया है। किन्तु वे इस आश्वासन से संतुष्ट हों कि सरकार संसद के समक्ष नियम रखेगी तो मैं वह वचनबंध करने के लिए तैयार हूं।
श्री कॉमथः संसद के समक्ष उनके रखे जाने के पश्चात् क्या संसद उनमें परिवर्तन करने के लिए सक्षम होगी?
डॉ. अम्बेडकरः मैं इसका भी सुस्पष्ट उत्तर नहीं दे सकता। मैं कुछ कठिनाई महसूस करता हूं। कठिनाई यह है उदाहरणार्थ, मान लीजिए सरकार किसी नियम जो विरचित किए गए हैं, के अधीन कार्रवाई कर सकती है और बाद में संसद इसे परिवर्तित कर देती है। तब, यथाविरचित नियमों के अधीन पहले की जा चुकी कार्रवाई का क्या होगा? अतः, जैसा श्री कॉमथ का प्रस्ताव है, किसी ऐसी शर्त द्वारा सरकार के हाथों को बांधना बहुत कठिन होगा।
श्री जे.आर. कपूरः क्या मैं खंड 167 का संशोधन प्रस्तुत कर सकता हूं। मैं प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता हूं।
खंड 187 के उप-खंड (2) के भाग (छ) के पश्चात् नया खंड (छछ) अंतःस्थापित करें।
माननीय अध्यक्षः शांत रहें, शांत रहें। संशोधन की संख्या क्या है।