34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 635

620 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्यथासंशोधित खंड 167, विधेयक का भाग बन गया।य्

प्रस्ताव अंगीकार किया गया।

यथासंशोधित खंड 167 विधेयक में जोड़ा गया।

नया खंड 34क

ऽपंडित ठाकुर दास भार्गवः मैं प्रस्ताव पेश की अनुमति चाहता हूँः

खंड 34. के पश्चात् निम्नलिखित नया खंड अंतःस्थापित करेंः

फ्34क (1) उम्मीदवार के नामांकन-पत्र को स्वीकार करने या नामंजूर करने के आदेश द्वारा व्यथित कोई उम्मीदवार उस जिले के जिला न्यायाधीश को आदेश पारित करने के चार दिनों के भीतर अपील करने का हकदार होगा जिसकी अधिकारिता में नामांकन-पत्र की संवीक्षा की गई है। आदेश की प्रति के साथ अपील की अर्जी लगी होगी यदि वह प्राप्त की गई हो या वह अपील की सुनवाई किए जाने के पूर्व फाइल की जा सकेगी।

(2) जिला न्यायाधीश सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में अपीलों की सुनवाई के लिए विहित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा और नामांकन-पत्र स्वीकार या अस्वीकार करने के आदेश की तारीख से पंद्रह दिनों के भीतर अपना अंतिम आदेश पारित करेगा।

(3) जिला न्यायाधीश तत्काल ऐसे रिटर्निंग अधिकारी को अपने आदेश की प्रति भेजेगा, जो तुंरत धारा 36 के अधीन यथाविहित रीति से इसे प्रकाशित करेगा।

(4) जिला न्यायाधीश का विनिश्चय अंतिम होगा और उसे किसी निर्वाचन अर्जी या अन्यथा द्वारा बाद में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा।य्

मूल विधेयक में यह स्वयं डॉ. अम्बेडकर का प्रस्ताव था कि जहां तक नामांकन का संबंध है इसे अंतिम रूप दिया जाना चाहिए और इस आधार पर कोई निर्वाचन अर्जी मंजूर नहीं की जानी चाहिए कि नामांकन के समय स्वीकृति या नामंजूरी का कोई उचित आदेश पारित नहीं किया गया था। यह सदन की साधारण धारणा के भी अनुरूप है। संभवतः सभी सदस्य अपवाद के बिना यह चाहते हैं कि मतदान होने के पश्चात् और किसी व्यक्ति द्वारा निर्वाचित घोषित हो जाने के पश्चात् ऐसा कोई प्रश्न न उठे कि नामांकन को पुनः प्रश्नगत किया जा रहा है। इतना अधिक व्यय उपगत हो जाने और सभी बातें हो जाने के पूर्व हमें यह सुनिश्यित कर लेना चाहिए कि नामांकन को अंतिम रूप दिया जा चुका है। अतः मैंने खंड 34क के अधीन नियमों से सेट बनाए हैं जिसके

ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 19 मई, 1951, पृष्ठ 9607-10