10. स्थगन के लिए प्रस्ताव हैदराबाद के मीर लायक अली का अभिरक्षा से निकल भागना - Page 67

52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं आपके द्वारा अधिकथित बिंदुओं का अनुसरण करूंगा। सर्वप्रथम मैं, एक ओर राज्यों की तथा दूसरी ओर केन्द्र की संविधानिक स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा कि राज्य किस सीमा तक केन्द्र से स्वतंत्र और मुक्त हैं तथा किस सीमा तक वे केन्द्र की आज्ञाकारिता या निगरानी या अधीक्षण या नियंत्रण के अधीन हैं

पहली बात जिसकी ओर मैं सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ, यह है कि केन्द्रीय सरकार और राज्यों के संविधानिक ढांचे में कुछ सीमा तक समान्तरता है। उदाहरण के लिए, केन्द्रीय सरकार के संबंध में आपके पास अनुच्छेद 53 है जो यह कहता है कि संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। उस अनुच्छेद के समरूप आपके पास अनुच्छेद 154 है जो वह कहता है कि राज्यों में कार्यपालिका शक्ति, यथास्थिति, राज्यपाल या राजप्रमुख में निहित होगी। जब हम वास्तविक प्रशासन की बात करते हैं तो संविधान का अनुच्छेद 74 यह उपबंध करता है कि संविधान द्वारा राष्ट्रपति में निहित कार्यपालिका प्राधिकार का प्रयोग करने के संबंध में उसकी सहायता और सलाह के लिए एक मंत्रि-परिषद होगी। इस अनुच्छेद के सदृश हमारे पास अनुच्छेद 163 भी है जो राज्यों से संबंधित है। इसकी भाषा में भी अनुच्छेद 74 के समान ही शब्द रखे गए हैं। यह कहता है कि प्रशासन, जो राज्यपाल या राज प्रमुख में निहित है, को चलाने के लिए राज्यपाल को सहायता और सलाह देने हेतु एक मंत्रि परिषद भी होगी। हमारे पास एक अन्य अनुच्छेद भी है जो दो सदनों से मिलकर बनी संसद में केन्द्र की विधायी शक्ति निहित करता है। उसके सदृश, लगभग समान शब्दावली में, राज्यों के लिए विधानमंडल गठित करने वाला एक अनुच्छेद 168 है सिवाए इस तथ्य के कि कुछ राज्यों में दो सदन हैं और अन्य राज्यों में एक सदन है। एक अन्य उपबंध यह किया गया है कि जहाँ संविधान के प्रारम्भ के समय किसी राज्य में लोकप्रिय रूप से गठित विधानमंडल अस्तित्व में नहीं है वहाँ राज्य का राजप्रमुख, उस राज्य के लिए विधिक रूप से गठित विधानमंडल समझा जाएगा। अतः यह देखा जाएगा कि दोनों मामलों में संविधान के अनुसार प्रशासन के तथाकथित साधन समान्तार हों। इसके संपूरण में, कैंने कल बताया था कि संसद का विधायी प्राधिकार प्राथमिक रूप से सूची में उल्लिखित विषयों तक सीमित रहता है, साथ में यह प्रतिपादना भी हैµजिसके संबंध में कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकती क्योंकि यह सुस्थापित न्यायिक प्रतिपादना हैµकि विधायी प्राधिकार कार्यपालिका प्राधिकार के समविस्तीर्ण है। जिसका यह अर्थ है कि जहाँ तक राज्यों का संबंध है उन्हें प्राथमिक रूप से और आधारिक रूप से संविधान में एक स्वतंत्र स्थिति प्राप्त है। ऐसा होने पर यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि शिष्टाचार के नियम द्वारा और नियम शासित उत्तरदायित्व द्वारा भी यह सदन इस बात के लिए स्वतंत्र नहीं होगा कि यह सूची II में उल्लिखित विषयों की परिधि के भीतर आने वाले किसी विषय पर या तो विधान के रूप में या ऐसी प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में कोई चर्चा करे जो राज्य द्वारा की गई हो। जैसा मैंने कल कहा था, जहाँ तक मैं समझता हूँ स्थगन प्रस्ताव की विषय-वस्तु मूलतः विधि और व्यवस्था से संबंधित है। विधि और