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व्यवस्था ऐसा विषय है जो सूची II में सम्मिलित किया गया है और इसीलिए सदन को यह अनुमति नहीं होगी कि यह ऐसे प्रश्न पर चर्चा करे जिसके लिए राज का विधानमंडल संविधान के नियम द्वारा इस संबंध में कार्यवाही करने के लिए सक्षम है। मेरे विचार में, यह एक सामान्य प्रतिपादना है और इसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
यदि माननीय सदस्य इस बात को स्पष्ट रूप से देखना चाहते हैं तो मैं उनसे यह कहना चाहूंगा कि वे अनुच्छेद 239 के उपबंधों की तुलना उस अनुच्छेद के उपबंधों से करें जिसके प्रति मैंने राज्यों के संबंध में निर्देश किया है। अनुच्छेद 239 भाग ‘ग’ के राज्यों के प्रति निर्देश करता है_ उन्हें फ्केन्द्र प्रशासित क्षेत्रय् कहा जाता है। अनुच्छेद 239 की भाषा अनुच्छेद 154 की भाषा से बिल्कुल भिन्न है। अनुच्छेद 154 की भाषा के अनुसार कार्यपालिका शक्ति, जिसमें प्रशासन भी सम्मिलित है, राज्यपाल में निहित है जबकि अनुच्छेद 239 के प्रारंभ में यह कहा गया है कि भाग ‘ग’ के राज्य राष्ट्रपति द्वारा प्रशासित होंगे, जिसका अर्थ फ्मंत्रि-परिषद की सलाह पर राष्ट्रपतिय् है, जिसका तात्पय्र यह है कि, जहाँ तक भाग ‘ग’ के राज्यों का संबंध है, प्रशासन के किसी भी मामले के लिए जिम्मेदारी प्रत्यक्ष रूप से संसद पर और केन्द्रीय सरकार पर पड़ती है। अतः कोई भी सदस्य, सदन के तल पर भाग ‘ग’ के राज्यों से संबंधित किसी भी विषय पर चर्चा कर सकता है, किंतु जहाँ तक अन्य राज्यों का संबंध है, उनके मामले में ऐसा नहीं होगा।
राज्यों के संबंध में, मैं यह भी बताना चाहूंगा कि यद्यपि हमारा संविधान राज्यों को कतिपय प्रयोजनों के लिए, जिन्हें मैं निर्दिष्ट कर चुका हूँ, भाग ‘क’ और भाग ‘ख’ में विभाजित करता है, अर्थात् उनके गठन का ढांचा, कार्यपालिका शक्ति का निहित होना, विधि बनाने का प्राधिकार आदि, फिर भी वे समानान्तर आधार पर हैं और उनके मध्य पूर्ण समानता है। यह भी सत्य है कि संविधान में एक अनुच्छेद 238 है जो भाग क के राज्यों पर लागू होने वाले अनुच्छेदों को कतिपय उपांतरणों के साथ भाग ‘ख’ के राज्यों पर लागू करता है। किन्तु जिसे अनुच्छेद 238 के उपबंधों की समीक्षा करने की जिज्ञासा है, वह यह पाएगा कि भाग ‘ग’ के राज्यों को लागू अनुच्छेदों में किए गए परिवर्तन भाग ‘ख’ के राज्यों को लागू होने में बहुत ही लघु प्रकृति के हैंµफ्राज प्रमुखय् के स्थान पर फ्राज्यपालय् का रखना, आदि मात्र शब्दावली संबंधी अंतर है। इससे अधिक बिल्कुल कोई भी अंतर नहीं है। अतः इस दृष्टिकोण से, जैसा कि यह सदन भाग ‘क’ के राज्यों की अधिकारिता के अंतर्गत आने वाले किसी भी मामले पर चर्चा करने के लिए सक्षम नहीं है, वैसे ही यह भी सदन की अधिकारिता के अन्तर्गत नहीं आएगा कि भाग ‘ख’ राज्यों के किसी मामले पर चर्चा की जाए क्योंकि, जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ, संविधान ने दोनों को एक ही आधार पर रखा है।
अब मैं हाल में माननीय गृह मंत्री द्वारा कही गई बात का समर्थन करना चाहूँगा। मात्र यह तथ्य कि निज़ाम राजप्रमुख है, मात्र यह तथ्य कि विधानमंडल नहीं है, मात्र यह तथ्य