10. स्थगन के लिए प्रस्ताव हैदराबाद के मीर लायक अली का अभिरक्षा से निकल भागना - Page 71

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

डॉ. अम्बेडकरः मैं उसी पर आ रहा हूँ। यह वही मुद्दा है जिसपर मैं चर्चा करना चाहता था क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण है और हमें इस संबंध में बहुत स्पष्ट होना चाहिए।

पंडित बालकृष्ण शर्माः क्या मैं जान सकता हूँ कि अनुच्छेद 371 के अधीन क्या निदेश जारी किया गया है?

डॉ. अम्बेडकरः मैं उसी पर आ रहा हूँ। मैं साधारण स्थिति, बता रहा हूँ। मेरे माननीय साथी गृह मंत्री बताएंगे, कि क्या निदेश जारी किया गया है। मैं प्रशासन का प्रभारी नहीं हूँ और मुझ से मात्र विधिक स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा गया है।

अब, श्रीमन्, मैं यह पता लगाने का प्रयास कर रहा था कि क्या हमारे विधानमंडल की विगत प्रक्रिया में कोई ऐसा उदाहरण है जो सदन के समक्ष मुद्दे पर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालने में हमारी सहायता कर सके। यह पता लगाने के लिए मैंने भारत शासन अधिनियम, 1919 के उपबंधों का अध्ययन किया है कि क्या कोई विनिर्णय है जिससे हमें किसी प्रकार का उदाहरण मिल सके। जैसाकि सदन को याद होगा, जहाँ तक प्रांतों का संबंध है, भारत शासन अधिनियम, 1919 की स्कीम प्रशासन के क्षेत्र को दो भागों में विभाजित करने की थीः अंतरित भाग और आरक्षित भाग। सदन को यह भी याद होगा कि पुराने भारत शासन अधिनियम के अधीन भारत के असैनिक और सैनिक शासन का अधीक्षण और नियंत्रण सपरिषद विदेश मंत्री में निहित था। यह भी उपबंध किया गया था कि सपरिषद गवर्नर तथा गवर्नर भी इस देश का प्रशासन चलाने के लिए विदेशी मंत्री के अधीक्षण और नियंत्रण के अधीन अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। वर्ष 1919 में प्रशासन के क्षेत्र को आरक्षित और अंतरित पक्षों में विभाजित करते समय एक नियम यह बनाया गया था कि अंतरित विषयों के रूप में वर्गीकृत विषय न तो विदेश मंत्री, न ही गवर्नर जनरल और न ही गवर्नर के पर्यवेक्षण, नियंत्रण के अधीन होंगे क्योंकि वे विधानमंडल की जवाबदेही मंत्रियों द्वारा प्रशासित थे। अब 1919 के अधिनियम के उपबंधों के अधीन उत्पन्न प्रश्न यह हैः क्या प्रांतों में प्रशासन से संबंधित कोई प्रश्न केन्द्रीय विधानमंडल द्वारा पूछा जाना संभव है। मेरे द्वारा किए गए अनुसंधानोंµऔर इस संबंध में अध्यक्ष के सचिवालय द्वारा उपलब्ध कराई गई सहायता के लिए मैं बहुत आभारी हूँµसे यह पता चलता है कि सभा के तत्कालीन सभापति का यह विचार था कि जहाँ तक अंतरित विषयों से संबंधित प्रश्न है, वे उन्हें अनुज्ञात नहीं करेंगे, किंतु यदि वे ‘आरक्षित विषयों’ के प्रति निर्देश करते हैं तो वे उन्हें गवर्नर जनरल की मंजूरी के अधीन रहते हुए अनुज्ञात करेंगे। आप को याद होगा कि ऐसी मंजूरी आवश्यक थी क्योंकि सभा नियमों और स्थायी आदेशों, दोनों के अधीन कार्य करती थी। नियम, गवर्नर जनरल द्वारा बनाए जाते थे जो कभी-कभी स्थायी आदेशों के क्षेत्राधिकार को निर्बन्धित कर देते थे। अतः उसकी अनुज्ञा आवश्यक थी। किंतु यह सिद्धांत अपनाया गया था कि जब तक प्रशासन