10. स्थगन के लिए प्रस्ताव हैदराबाद के मीर लायक अली का अभिरक्षा से निकल भागना - Page 72

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गवर्नरों, गवर्नर जनरल और अन्ततः विदेश मंत्री के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अधीन जारी रहता है, उन विषयों के संबंध में केन्द्रीय विधानमंडल के किसी सदस्य के लिए कोई प्रश्न पूछना संभव है और सभापति, अन्य शर्तों के पूरा किए जाने के अधीन रहते हुए, उन प्रश्नों को ग्रहण करेगा। यह एक उदाहरण है। वास्तव में इसे इस क्षेत्र तक विस्तारित नहीं किया जाना चाहिए जो इसके अन्तर्गत न आता हो। जैसा कि मैंने बताया, यह केवल प्रश्नों तक विस्तारित है, न कि अन्य विषयों तक।

अब मैं, भारत शासन अधिनियम, 1935 पर आता हूँ। संभवतः सदन के कुछ सदस्यों को याद होगा कि जैसे ही भारत शासन अधिनियम, 1935 पारित हुआ था, हाउस आफ़ कॉमन्स के कुछ सदस्य, भारत के प्रशासन के संबंध में संसद में विदेश मंत्री से प्रश्न पूछने के अपने अधिकारों को लेकर बहुत अधिक उत्तेजित थे और 1937 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री चेम्बरलेन से एक प्रश्न पूछा गया था। श्री चेम्बरलेन ने इस आशय का उत्तर दिया था कि चूंकि देश का प्रशासन भारत में अभिकरणों को अंतरित कर दिया गया है और उस सीमा तक विदेश मंत्री के पास वास्तविक प्रशासन के लिए किसी भी प्रकार का उत्तरदायित्व नहीं रह गया है, इसलिए संसद सदस्यों के लिए यह संभव या अनुज्ञेय नहीं होगा कि वे विदेश मंत्री से उन विषयों पर कोई प्रश्न पूछें। हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रश्न पूछे जाने के तुरन्त पश्चात् यहाँ भी इस विषय पर विचार किया गया और हमारे पुराने मित्र श्री पांडे द्वारा जो इस सभा के जाने माने सदस्य हैं तत्कालीन विधि सदस्य सर नृपेन्द्र सरकार से एक प्रश्न पूछा गया था। सर नृपेन्द्र सरकार द्वारा दिया गया उत्तर मैं पढ़ना चाहता हूँ, क्योंकि यह बहुत ही प्रबोधक उत्तर है और, मेरी राय में, वह उस निष्कर्ष का समर्थन करता है जिस पर मैं पहुँचा हूँ और जो मैंने अभी व्यक्त किया है।

सर नृपेन्द्र सरकार का उत्तर निम्नानुसार थाः

फ्(क) सामान्य स्थिति यह है कि जहाँ अधिनियम के अधीन कार्यपालिका और विधायी प्राधिकार प्रांतों में निहित है, वहाँ केन्द्रीय विधानमंडल के लिए उन विषयों पर चर्चा करना समुचित नहीं होगा। तथापि, कुछ ऐसे विषय हो सकते हैं, जिनमें केन्द्रीय विधानमंडल उचित रूप से हितबद्ध हो (यथाµभारत शासन अधिनियम की धारा 126 की उपधारा (1) और (2) के अधीन कोई निदेश) और इस तरह प्रांतीय क्षेत्र पर किसी अतिक्रमण का निवारण, प्रश्नों के संबंध में भारतीय विधायी नियमों के नियम 7 के अधीन माननीय सभापति में और संकल्पों के संबंध में नियम 22 के अधीन गवर्नर जनरल में निहित शक्तियों द्वारा विनियमित होने के लिए छोड़ दिया जाए।य्

मेरा निवेदन यह हैः कि अनुच्छेद 371 में अंतर्विष्ट उपबंध लगभग सदृश हैं। मैं यह नहीं कहता हूँ कि वे भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 126 में अंतर्विष्ट उपबंधों के बिल्कुल समान है। 1935 के अधिनियम ने शक्ति गवर्नर जनरल में निहित की थी। यह कहता हैः