10. स्थगन के लिए प्रस्ताव हैदराबाद के मीर लायक अली का अभिरक्षा से निकल भागना - Page 74

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को निदेश देने का अधिकार रखती है तो क्या ऐसे निदेश उस सभा में चर्चा का विषय हो सकते हैं जिनके प्रति वह विशिष्ट सरकार जिम्मेदार है? यही प्रश्न है। मैं वृहत्तर मुद्दे के लिए धारा 126 का उपयोग नहीं कर रहा हूँ। मैं इसका उपयोग एक सीमित मुद्दे के लिए कर रहा हूँ, अर्थात् जहाँ कहीं निदेश देने की शक्ति है वहाँ उस शक्ति से जिम्मेदारी विवक्षित है एवं जहाँ कहीं जिम्मेदारी है, वहाँ चर्चा होनी चाहिए। मेरी यह राय है।

अब, श्रीमन्, आपने मुझे यह स्पष्ट करने के लिए कहा है कि फ्साधारण नियंत्रणय् का क्या अर्थ है। अब मुझे यह प्रतीत होता है कि फ्साधारण नियंत्रणय् शब्दों का प्रयोग उस विशिष्ट राज्य के भीतर उत्पन्न प्रशासन के प्रत्येक मामले को सम्मिलित करने के लिए किया गया है। निदेश को किसी विशिष्ट मामले तक सीमित करने की आवश्यकता नहीं। आज निदेश पुलिस प्रशासन के संबंध में दिया जा सकता है कल यह राजस्व प्रशासन के संबंध में दिया जा सकता है_ बाद में यह आवश्यक समझा जा सकता है कि वैसा ही निदेश वित्त की बाबत दिया जाए। फ्साधारण नियंत्रणय् से प्रशासन के पूर्ण क्षेत्र पर विस्तारित नियंत्रण अभिप्रेत है। मैंने साधारण नियंत्रण शब्द का इसी अर्थ में प्रयोग किया है।

मेरा यह मानना है कि मेरे लिए यह अनुज्ञेय नहीं होगा कि मैं इसका इतिहास बताऊँ कि इस अनुच्छेद का प्रारूपण कैसे किया गया। मैं आपसे इसकी अनुज्ञा नहीं मागूँगा और यदि आप दे भी दें तो भी मैं उसका प्रयोग नहीं करूंगा। किंतु मेरे मन में यह पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि इस अनुच्छेद में क्या-क्या सम्मिलित करने का आशय था। यह अनुच्छेद ऐसे विभिन्न अनुच्छेदों, जिनका निर्देश मैं कर चुका हूँ अर्थात् 154, 162, 163 और 168 के अंतर्गत राज्य को दी गई शक्तियाँ कार्यपालिका प्राधिकार कीं, प्रशासन की और विधान की शक्तियाँ वापस नहीं लेता। किंतु सुशासन के हित में इस ने केन्द्र द्वारा दिए गए निदेश का प्राधिकार अध्यारोपित कर दिया ताकि प्रशासन का स्तर नीचे न चला जाए। श्रीमन् अनुच्छेद 371 का यही भावार्थ है।

डॉ. आर.यू. सिंह (उत्तर प्रदेश)ः श्रीमन्, क्या मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ? क्या यह दलील दी गई है कि जब नियंत्रण का प्रयोग किया गया हो, या प्रयोग किया जा रहा हो, और निदेश दिए गए हों तो संसद उस मामले पर चर्चा करने के लिए सक्षम नहीं हैं?

माननीय अध्यक्षः वे बिल्कुल प्रतिकूल बात कर रहे हैं।

डॉ. अम्बेडकरः श्रीमन्, आपने इस प्रश्न का उल्लेख किया था कि क्या विधानमंडल है या विधानमंडल नहीं है, यह ऐसा मामला है, जिसपर, किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए, विचार किया जा सकता है।

सैद्धांतिक रूप से बेशक, किसी विधानमंडल के अस्तित्व में होने या अस्तित्व में न होने पर विचार नहीं किया जा सकता क्योंकि अनुच्छेद 385 में संविधान स्वयं स्पष्ट रूप