60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से कहता है कि जहाँ विधानमंडल न हो, वहाँ राजप्रमुख को विधानमंडल समझा जाएगा। किंतु यह ऐसा कह सकता है, क्या कोई स्थानीय विधानमंडल है या नहीं जहाँ यह विशिष्ट मुद्दा उत्तेजित किया जा सकता हो, इस मामले में विगत प्रतीत होता है, जैसाकि उन्होंने, फ्चर्चाय् शब्द का प्रयोग किया है, इसमें स्थगन प्रस्ताव भी सम्मिलित हो सकता है।
अब, श्रीमन्, मैं दूसरे प्रश्न पर आता हूँ जिसे पूछने के लिए में आपका आभारी हूँ। फ्अनुच्छेद 371 की परिधि क्या है, अब, श्रीमन, अनुच्छेद 371 को पढ़कर मैं एक महत्वपूर्ण बात का उल्लेख करना चाहता हूँ और वह यह है कि अनुच्छेद भारत सरकार पर साधारण नियंत्रण रखने का कर्तव्य अधिरोपित नहीं करता है। यह ऐसा अनुच्छेद नहीं है जो कर्तव्य अधिरोपित करे। यह ऐसा अनुच्छेद है जो भारत सरकार को निदेश देने के लिए अनुज्ञात करता है। अब, श्रीमन्, जो अंतर मैं करने जा रहा हूँ वह बहुत महत्वपूर्ण अंतर है और इसे स्पष्ट रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए।
श्री कामथ (मध्य प्रदेश)ः क्या मैं यह बता सकता हूँ कि अनुच्छेद 371 में प्रयुक्त भाषा निम्नानुसार हैः
फ्........प्रत्येक राज्य की सरकार........के साधारण नियंत्रण में होगी।......आदि आदि।य्
डॉ. अम्बेडकरः फ्होगीय् का क्या अर्थ है? अधीन रहना राज्य का कर्तव्य है। केन्द्रीय सरकार का कोई कर्तव्य नहीं है।
श्री कामथः इसमें पारस्परिकता है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, इसमें कोई पारस्परिकता नहीं है।
अब स्थिति इस प्रकार है। इस दृष्टिकोण से वह अंतर महत्त्वूपर्ण है। जब कुछ निश्चित करने का कर्तव्य होता है तब या तो कर्तव्य के गलत पालन पर अथवा कर्तव्य का पालन न करने पर निन्दा प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। किंतु यदि इस बात पर सहमति हो जाती है कि यह अनुच्छेद भारत सरकार को बेहतर प्रशासन के हित में, कतिपय अवसरों पर या कतिपय स्थितियों में प्रांतीय सरकार को यह बताते हुए मात्र कुछ निदेश देने के लिए अनुज्ञात करता है कि वे यह कह सकते हैं अथवा वे यह नहीं कर सकते तो मैं इस पर सुनिश्चित हूँ कि विचारण के लिए उत्पन्न मात्र प्रश्न यह होगा कि क्या निदेश दिया गया था, क्या निदेश उचित था और क्या ये देखने के लिए कोई कदम उठाया गया था कि निदेशों का अनुपालन किया गया है। यदि केन्द्रीय सरकार को अपनी प्रज्ञा में, अपने विवेक में यह महसूस हो कि इस तथ्य के होते हुए भी कि उस स्थिति में कुछ ऐसे तत्व थे जो आदेश करने की आवश्यकता बनाते थे, यह आवश्यक, उचित या प्रज्ञावान नहीं समझा कि निदेश दिया जाए तो ऐसा न करने के लिए केन्द्रीय सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मेरा निवेदन है कि इस अन्तर को ध्यान में रखा जाना चाहिए।