11. संसद (निरर्हता निवारण) विधेयक - Page 80

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पंडित कुंज़रुः मेरे विचार में यह चर्चा बिल्कुल निष्फल रहेगी और मैं यह सोचने का साहस करता हूँ कि यदि हम इसे कल तक के लिए स्थगित कर दें तो चर्चा शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी।

ऽऽऽडॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरे मित्र श्री त्यागी द्वारा उठाए गए पहले मुद्देµफ्क्या इस तरह का उपाय किए जाने की कोई आवश्यकता है,य् पर मेरा विचार है कि प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा वह पर्याप्त होना चाहिए और मैं मात्र स्पष्टीकरण के लिए यह और जोड़ना चाहूँगा किः हमारी वास्तविक कठिनाई इस तथ्य के कारण उत्पन्न हुई है कि परिभाषा अनुच्छेद, अनुच्छेद 366, फ्मंत्रीय् शब्द को परिभाषित नहीं करता। अतः फ्मंत्रीय् शब्द का निर्वचन दो प्रकार से किए जने के लिए रह जाता हैµया तो बृहत्तर तौर पर जिसमें केवल वे सदस्य ही नहीं होंगे जो मंत्री हैं बल्कि वे सदस्य भी होंगे जो उपमंत्री या राज्य मंत्री हैं। बोलचाल के अर्थ में इसमें संसदीय सचिव और संसदीय अवर सचिव भी सम्मिलित होंगे। एक तो यह निर्वचन है जो पूरी तरह संभव है, किंतु इसका संकीर्ण अर्थान्वयन किया जाना भी संभव है जिसमें मंत्रियों से अभिप्रेत उप मंत्रियों, राज्य मंत्रियों, संसदीय सचिवों या संसदीय अवर सचिवों सहित मंत्री नहीं होगा बल्कि मात्र मंत्रिपरिषद के सदस्य अभिप्रेत होगा। जैसाकि सदन जानता है, रूढि़गत रूप सेµमैं जान-बूझकर फ्रूढि़गत रूप सेय् शब्दों का प्रयोग कर रहा हूँµमंत्रियों, जो मंत्रिपरिषद के सदस्य हैं और उन मंत्रियों के बीच जो मंत्री परिषद के सदस्य नहीं हैं, प्रत्यक्ष अंतर हैं और किसी भी व्यक्ति के लिए, न्यायालय के लिए भी यह बिल्कुल संभव है कि इसका संकीर्ण अर्थान्वयन किया जाए और फ्मंत्रियोंय् शब्द का विधितः निर्वचन केवल मंत्रिपरिषद् के सदस्यों तक सीमित हो जाए, जिसमें निस्संदेह स्थिति.......।

पंडित कुंज़रुः मेरे माननीय मित्र किस न्यायालय का हवाला दे रहे हैं?

डॉ. अम्बेडकरः कोई भी न्यायालय। मैं इसपर भी आ रहा हूँ। मैं साधारण रूप में ही बोल रहा हूँ। कोई भी व्यक्ति उस निर्वचन पर प्रश्न उठा सकता है। यदि उस निर्वचन पर प्रश्न उठाया जाता है तो निश्चित रूप से कठिनाइयाँ आएँगी, इसीलिए सावधानी के तौर पर और किसी भी प्रकार की कठिनाई या संदेह को दूर करने के लिए इस विधेयक को लाया गया है, और जैसाकि मैंने कहा था, यदि मेरे मित्र श्री त्यागी द्वारा किया गया निर्वचन ऐसे स्थान पर बरकरार रखा जाता है जहां ऐसे प्रश्न उठाए हाने की संभावना है, तो कोई भी अप्रसन्न नहीं होगा यदि तब यह पाया जाए कि विधेयक अनावश्यक है, किंतु दुर्भाग्यवश, मेरे मित्र श्री त्यागी द्वारा सम्बोधित इस महान, विस्तारित और मूल तर्क के होते हुए भी यदि यह पाया जाए कि अर्थान्वयन ठीक अर्थान्वयन नहीं है तो निश्चित रूप से यह निष्कर्ष निकाला जाएगा कि संसद ने इस विधेयक को पारित करके

ऽऽऽसं. वा., खंड 2, भाग II, 10 मार्च, 1950 पृष्ठ 1344-48