70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
होगा या नहीं, इसलिए वहाँ कोई साधारण सिद्धांत नहीं है। प्रत्येक मामले पर विशिष्टता के साथ कार्यवाही की जाती है और एनसन के खंड 1 में बहुत लम्बी सूची दी गई है। इसमें प्रत्येक अधिनियम, उसके द्वारा सृजित पद और क्या उस विशिष्ट अधिनियम के अधीन पद का धारक संसद सदस्य बना रहेगा अथवा नहीं, यह सब उल्लेख किया गया है। मैं समझता हूँ, इसीलिए हमें बहुत सावधान रहना होगा।
एक बात, को मैं स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ, अर्थात्, जो सदस्य पहले से ही पद धारण किए हुए हैं, जिससे, जैसा कि मैंने कहा, वे निरर्हित हो सकते हैं, तो यदि उन्हें तुरन्त अपने पद त्यागने पड़ें तो इसमें कुछ प्रशासनिक कठिनाइयाँ आ सकती हैं। कार्य रुक सकता है और यह संभव ही नहीं बल्कि वांछनीय हो सकता है कि वर्तमान में उन पदों के धारकों के संबंध में निरर्हता को हटाने का लघु उपाय अपनाया जाए जिससे कि हमें बाद में इस पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके कि हम कौन से साधारण सिद्धांत अपनाएं। यदि मेरे द्वारा दिए गए सुझावों को क्रियान्वित करने में कुछ विलंब हो जाए तो हम भूतलक्षी प्रभाव देकर एक क्षतिपूर्ति अधिनियम पारित करके इसका परिशोधन कर सकते हैं जिससे कि इस समय पदों के सभी धारक ऐसी निरर्हता से ग्रस्त न हों। मैं नहीं समझता कि हम इस मामले में शीघ्र ही कोई विचार कर किसी उचित विचारण या विवेचन के बिना किसी या हर व्यक्ति को छूट देने वाला साधारण खंड को रख सकते हैं। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि यदि निरर्हता विभिन्न समितियों में कार्य करने वाले सदस्यों पर किसी शर्त के बिना लागू की गई तो कुछ कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। यदि सदन चाहे तो मैं एक खंड के एक छोटे से उपाय पर विचार करने और उसे भूतलक्षी प्रभाव देकर सदन के समक्ष प्रस्तुत करने एवं इसमें एक क्षतिपूर्ति खंड जोड़ने के लिए तैयार हूँ ताकि यदि विधिक स्थिति में कोई कमी हो तो यह न समझा जाए कि सदस्य ने अपना स्थान रिक्त कर दिया। इस अवस्था में मैं इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता।
जहाँ तक विधेयक में से अंशकालिक पदों के लोप का संबंध है, मेरे विचार में पहले ही मेरे द्वारा दिया गया उत्तर, कि पद धारकों को छूट का सिद्धांत विस्तारित करते समय हमें सावधान रहना होगा, उन पर भी लागू होता है। मैं यह कह सकता हूँ कि इस अध्यादेश का मूल खंड, युद्धकालीन अध्यादेश, जो 1942 का अध्यादेश सं. II था, से लिया गया है। मेरे मित्र श्री कामथ इस बात को समझेंगे कि आपातकाल में सिद्धांत को व्यापक बनाना पूर्ण रूप से विधिसंगत होगा, जब भरे जाने के लिए पदों की संख्या अधिक हो और उपलब्ध व्यक्तियों की संख्या बहुत कम हो और ऐसे अवसरों पर कार्यवहन हेतु सदस्यों को लेने के लिए हमें आवश्यक रूप से संसद में जाना पड़ता है। किंतु युद्धकाल में और आपातकाल में जो आवश्यक है, उसे सामान्य काल में लागू नहीं किया जाना चाहिए। यह विचार मुझपर अभिभावी रहा जिसके कारण मैंने उस खंड का