11. संसद (निरर्हता निवारण) विधेयक - Page 86

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लोप किया जो अध्यादेश में मूल रूप से रखा गया था।

श्री कामथः क्या इस अध्यादेश का प्रारूप स्वयं विधि मंत्रालय ने तैयार नहीं किया था?

डॉ. अम्बेडकरः विधि मंत्रालय भूल सकता है और उसे क्षमा भी किया जा सकता है। विधि मंत्री सर्वज्ञ नहीं है। मैं सीखने के लिए जीता हूँ और यदि में अपने मित्र श्री कामथ से कुछ सीख पाऊं, तो मैं उनका बहुत आभारी रहूँगा। मुझे बस इतना ही कहना है।

श्री कामथः खड़े हो गए।

माननीय उपाध्यक्षः मध्याहन-भोजन के लिए स्थगन के पूर्व हमारे पास केवल तीन मिनट शेष हैं। मैं आशा करता हूँ कि माननीय सदस्य तीन मिनट से अधिक समय नहीं लेंगे।

श्री कामथः मुझे कुछ विधिक और संविधानिक मुद्दे प्रस्तुत करने हैं और मुझे तीन मिनट से अधिक समय लगेगा।

प्रारम्भ में, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरी राय में, संविधान निर्माण के दौरान मैंने डॉ. अम्बेडकर से बहुत कुछ सीखा है और मुझे उनसे अभी बहुत कुछ सीखना है_ मैं उनकी यह प्रशंसोक्ति दोहराना चाहता हूँµइस विधेयक को शीघ्र और जल्दी पारित किए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि यदि यह विधेयक आज मध्यरात्रि के पूर्व अर्थात् 10 तारीख को सदन द्वारा पारित हो जाए तो भी उपमंत्रियों और राज्य मंत्रियों की सदस्यता संविधानिक रूप से विधिमान्य नहीं हो जाएगी_ इससे उनके द्वारा पहले से उपगत निरर्हता समाप्त नहीं होगी।

डॉ. अम्बेडकरः आपकी इजाजत से, श्रीमन्, मैं मात्र यह कहना चाहता हूँ कि इस बात में कुछ भी मौलिक नहीं है। इसे पटना उच्च न्यायालय के मत से लिया गया है। किंतु मैं देखता हूँ कि मेरे दोनों मित्र श्री त्यागी और श्री कामथ इस बात को उठा रहे हैं। राष्ट्रपति न्यायालय नहीं होता_ राष्ट्रपति न्यायालय द्वारा व्यक्त राय से बिल्कुल भिन्न राय रख सकता है।

ऽश्री कामथः संविधान में इसे कहीं भी स्पष्ट नहीं किया गया है। जैसा कि डॉ. अम्बेडकर ने कहा, यह केवल मंत्रिमंडल सदस्यों के प्रति निर्देश करता है और यही कारण है कि राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश प्रख्यापित किया गया।

श्रीमन्, अगला मुद्दा यह है।

ऽसं. वा., खंड 2, भाग II 10 मार्च, 1950, पृष्ठ 1349-50