11. संसद (निरर्हता निवारण) विधेयक - Page 88

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डॉ. अम्बेडकरः मैं मामले की गुणता में दिलचस्पी रखता हूँ।

श्री कामथः श्रीमन् कम से कम विधि मंत्री के लिए यदि वे सत्यतः वस्तुतः और गंभीर विधि मंत्री हैंµविधिक मुद्दे उतने ही गुणता के मामले होंगे, जितने विधि के।

माननीय उपाध्यक्षः माननीय विधि मंत्री को गलत समझने का क्या फायदा? उनका कहना है कि फ्जहाँ तक विधि का संबंध है, वह मुझपर छोड़ दिया जाए। कृपया मुझे तथ्यों से, यदि कोई हों, अवगत कराएँ।य्

श्री कामथः क्या मैं इस सदन का सदस्य होने के नाते अधिकार पूर्वक यह जान सकता हूँ कि यदि कोई मंत्री एक विशिष्ट मन व्यक्त करे तो क्या कोई सदस्य सदन के विशेषाधिकार का कोई मुद्दा नहीं उठा सकता? मुझे नहीं पता कि भविष्य में उनके लिए क्या रखा हुआ है_ संभवतः वे किसी अन्य विभाग के बारे में सोच रहे होंगे। मुझे विभागों में परिवर्तन के संबंध में कोई भी जानकारी नहीं है। किंतु समाचार-पत्रों में ऐसी अनेक रिपोर्टें आ रही हैं। किंतु मैं यह महसूस करता हूँ कि सदन में यह नहीं कहा जाना चाहिए था कि विधि मंत्री को विधि की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है।

डॉ. अम्बेडकरः संसद न्यायालय नहीं है।

संसद (निरर्हता निवारण) विधेयक

ऽमाननीय उपाध्यक्षः डॉ. अम्बेडकर।

डॉ. अम्बेडकरः मुझे लगता है कि सदस्य वास्तव में ऐसे स्थान पर पहुँच गए हैं जो इस विधेयक में अंतर्निहित प्रमुख प्रतिपादना से बहुत दूर है। मुझसे यह स्पष्ट करने के लिए कहा गया है कि यह संदेह कैसे उत्पन्न हुआ? यह पहले किसके मन में उत्पन्न हुआ? मुझे यह स्पष्ट करने के लिए कहा गया है कि किसी अन्य देश, जैसे आस्ट्रेलिया या कनाडा में ऐसा विधान आवश्यक क्यों नहीं समझा गया है।

ठीक है, जहाँ तक प्रथम मुद्दें का संबंध है, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं स्वयं संदेह महसूस करता था। मैं इसे स्वीकार करता हूँ, क्योंकि लगाए गए अनेक आरोपों के होते हुए भी कुछ सीमा तक संविधान के निर्माण में मेरा भी योगदान रहा है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मुझे विश्व के ऐसे किसी भी संविधान की जानकारी नहीं है जिसके बारे में यह कहा जा सके कि वह संदेह के प्रति है। किसी भी प्रकार की गलतफहमी के प्रति अभेद्य, अन्यथा यदि प्रत्येक संविधान संदेह के प्रति अभेद्य होता जो विभिन्न देशों के उच्चतम न्यायालयों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में विनिश्चय न दिए गए होते। अतः यदि मैं, प्रारूपण समिति के अध्यक्ष के रूप में भी, यह महसूस करता था कि इस मामले में कोई संदेह है तो मुझे इसे स्वीकार करने में कोई लज्जा

ऽसं. वा., खंड 2, भाग II, 10 मार्च, 1950, पृष्ठ 1360-64