11. संसद (निरर्हता निवारण) विधेयक - Page 89

74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं है और जब मैं यह कहता हूँ कि इस मामले में कोई संदेह है तो इसे मेरे आचरण की अक्खड़ता न समझा जाए।

मैं यह स्पष्ट करूंगा कि मुझे संदेह क्यों हुआ। मेरे मित्र कृष्णमाचारी ने कहा था कि फ्मंत्री परिषदय् पद वास्तव में भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया गया था जहां प्रयुक्त भाषा फ्मंत्रि परिषदय् थी और स्पष्ट रूप से वह भाषा 1935 के अधिनियम के प्रारूपकार द्वारा पुराने अधिनियम से ली गई थी जहाँ फ्कार्य परिषदय् शब्दों को किया गया था। अब मैंने महसूस किया कि यदि कोई व्यक्ति फ्मंत्रि-परिषदय् पद का निर्वचन करे तो निस्संदेह रूप से उस पर विचार करने के लिए न्यायोचित होगा कि कार्य-परिषद पद का प्रयोग किए जाने के समय क्या परिस्थितियाँ थीं ओर मंत्रि-परिषद पद के आशय का निर्वचन फ्कार्य-परिषदय् के प्रतिनिर्देश से करने में न्यायोचित होगा। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि फ्कार्य-परिषदय् से कार्य-परिषद के केवल मंत्रि के पद वाले सदस्य अभिप्रेत थे क्योंकि उस समय लोगों का ऐसा कोई वर्ग विद्यमान नहीं था जिसे हम उप मंत्री या राज्य मंत्री या संसदीय सचिव या संसदीय अवर सचिव कहते हैं। ये ऐसे पद हैं जिन्हें भारत शासन अधिनियम, 1935 के मूल रूप में अस्तित्व में न रहने के लम्बे समय बाद सृजित किया गया था। अतः मैंने यह महसूस किया कि संभवतः चूंकि हमने फ्मंत्रीय् या फ्मंत्री परिषदय् शब्दों को परिभाषाओं से संबंधित अनुच्छेद में विशेष रूप से परिभाषित नहीं किया है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति यह सुझाव देने के लिए स्वतंत्र होगा कि फ्मंत्रि परिषदय् पद का उपयोग उसी अनुरूपता में किया गया था जैसा कि फ्कार्य-परिषदय् का था और इसीलिए हर व्यक्ति यह करने के लिए स्वतंत्र होगा कि इन अधिकारियों का सम्मिलित किया जाना उद्दिष्ट नहीं था।

यह उस संदेह का आधार है जिसे मैंने महसूस किया था एवं मुझे कोई कारण प्रतीत नहीं होता कि मामला संदेह के परे करने के लिए संसद से एक विधि पारित करने के लिए क्यों न कहा जाए। इसीलिए, मैं नहीं समझता कि सरकार ने संसद से ऐसा विधेयक पारित करने के लिए प्रस्ताव करके कोई अनुचित प्रयास किया है जिसका उद्देश्य संदेह दूर करना है। मैं ऐसे बहुत से मामलों का उल्लेख कर सकता हूँ जहाँ कि सांसदों द्वारा संदेह दूर करने के लिए प्रयोजन से अधिनियम पारित किए गए हैं और मैं नहीं समझता कि इस विधेयक के संबंध में संसद से वैसा ही अनुरोध करके मैं उससे कुछ असाधारण कार्य करने के लिए कह रहा हूँ।

मेरे मित्र पंडित कुंज़रु द्वारा उठाए गए इस बिंदु के संबंध में कि कनाडा या आस्ट्रेलिया या अन्य डोमिनियनों में सरकारें ऐसे किसी विधान के बिना, जैसा कि अब प्रस्ताव किया गया है, कार्य संचालन कर रही हैं, मैं वास्तव में उनसे यह जानना चाहता हूँ कि क्या उनका विचार है कि आस्ट्रेलिया या कनाडा के संविधान में ऐसा कोई अंतंर्विष्ट नहीं है जैसा कि अनुच्छेद 102 में अंर्तनिहित है, जिसमें लाभ का पद धारित करने के आधार