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सेना विधेयक
रक्षा मंत्री (सरदार बलदेव सिंह)ः मैं प्रस्ताव पेश करने की इजाजत चाहता हूँः
फ्कि प्रवर समिति की रिपोर्ट के अनुसार नियमित सेना के शासन विषयक विधि के समेकन और संशोधन के विधेयक पर विचार किया जाए।य्
ऽमाननीय अध्यक्षः माननीय डॉ. अम्बेडकर।
विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर)ः यदि अन्य माननीय मित्र बोलना नहीं चाहते, तो मैं समझता हूँ कि मेरे माननीय मित्र पंडित कुंज़रु द्वारा उठाए गए बिंदुओं का उत्तर मैं दूँगा क्योंकि उनमें संविधानिक पहलू निहित हैं।
माननीय अध्यक्षः मैं उन्हें अग्रता दूँगा।
डॉ. अम्बेडकरः मेरे माननीय मित्र पंडित कुंज़रु ने प्रस्ताव पर अपने भाषण के दौरान दो बिन्दु उठाए थे। चूंकि उनमें माले के संविधानिक पहलू का उल्लेख है, इसलिए मैंने सोचा कि यह समुचित होगा कि इन्हें अपने माननीय साथी के लिए छोड़ने के बजाए मैं ही उनसे निपटूँ।
प्रथम बिन्दु यह था कि विधेयक के खंड 4 और 5 इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए अनुपयुक्त हैं कि उन्होंने भाग ‘ख’ राज्यों में बलों का अलग से उल्लेख किया है। मैं इन धाराओं पर अलग-अलग विचार करूँगा।
धारा 4 के संबंध में, मेरा विचार है कि मेरे माननीय मित्र इस बात से सहमत होंगे कि इस अधिनियम की स्कीम के अधीन नियमित सेना के नाम से ज्ञात और बलों के मध्य, जो नियमित सेना का भाग नहीं है, एक अन्तर किया जाना चाहिए। मेरे मित्र देखेंगे कि नियमित सेना को धारा 3 की मद 21 के संबंध में है, परिभाषित किया गया है। उदाहरण के लिए, असम राइफल्स, भील कोर्प्स के नाम से ज्ञात और अन्य अनेक यूनिटों का उल्लेख दृष्टांतों के रूप में किया जा सकता है जो नियमित सेना के अंग नहीं हैं। चूंकि अधिनियम मुख्य रूप से नियमित सेना को लागू होता है, इसलिए किसी ऐसी संभाव्यता के लिए उपबंध किया जाना आवश्यक है जहाँ इस अधिनियम के उपबंधों को ऐसी यूनिटों तक विस्तारित और लागू करना पड़ेगा जो नियमित सेना के अंग नहीं हैं। यही धारा 4 का प्रयोजन है। धारा 4 कहती है.........
पंडित कुंज़रुः क्या ये बल भाग ‘ख’ राज्यों के बल हैं?
ऽसं. वा., खंड 4, भाग II, 6 अप्रैल, 1950, पृष्ठ 2601-5