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डॉ. अंबेडकर का त्याग-पत्र
* माननीय उपाध्यक्ष : मैंने कहा था कि यदि डॉ. अंबेडकर चाहें तो वह 6 बजे
अपना वक्तव्य दे सकते हैं। किंतु वह अपनी सीट पर नहीं हैं। किसी भी माननीय
मंत्री को जिसने त्याग-पत्र दिया हो, अध्यक्ष की अनुमति से, प्रश्न काल के तत्काल
बाद, वक्तव्य देने की अनुमति दी जा सकती है। आज अल्प सूचना प्रश्न के बाद
प्रश्न-काल समाप्त हो गया था और डॉ. अंबेडकर ने निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन संबंधी
प्रस्तावों का संचालन किया था और इसीलिए यह कार्य त्तकाल नहीं किया जा सका,
जब वह वक्तव्य देना चाहते थे। तत्पश्चात् मैंने सोचा कि प्रथा के अनुसार, अथवा
प्रश्न काल के तुरंत बाद वह ऐसा कर सकते हैं या दिन के अंत में 6 बजे कर सकते
हैं। इसलिए मैंने 6 बजे का समय निर्धारित कर दिया था। मुझे उनको यह अवसर
अब प्रदान करने में प्रसन्नता होगी किंतु वह अब उपस्थित नहीं हैं।
जहाँ तक वक्तव्य की प्रति का संबंध है, वह सच है कि जब वह मौखिक वक्तव्य
देना चाहते थे, तब वह मेरे कक्ष (चेंबर) में आए थे, उस समय मेरे दिमाग में यह बात
नहीं आई थी कि मैं उनसे कहूँ कि वह अपना वक्तव्य लिखित रूप में मुझे दे दें यह
बात ठीक नहीं थी। इसीलिए मैंने उनको वक्तव्य देने की अनुमति दे दी थी और यह
भी कहा था कि यदि वह प्रश्न काल के तुरंत बाद वक्तव्य न दे सकें तो मैं नियमों
को निलंबित कर दूंगा। किंतु आज प्रातः मैंने देखा कि जो बात वह वक्तव्य के माध्यम
से कहना चाहते थे, उन्होंने वह लिखित रूप में दे दी और एक प्रधानमंत्री जो सदन
के नेता भी हैं को भी दे दी। स्वभावतः मैंने वक्तव्य देने के लिये उठने से काफ़ी पहले
सचिव के माध्यम से उन्हें कहलवा भेजा था कि वह मुझे वक्तव्य की एक प्रति भेज
दें। मुझे खेद से कहना पड़ता है कि उन्होंने मुझे उस वक्तव्य की प्रति नहीं भेजी।
मैं इसका कोई कारण नहीं जानता। मेरा काम वाद-विवाद को विनियमित करना है;
मैं उस वक्तव्य के संबंध में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहता था। जब सदन में कोई
वक्तव्य पढ़ा जाता है तो संबंधित व्यक्ति सामान्य तौर पर उसकी एक प्रति मुझे दे
* संसदीय वाद-विवाद, जिल्द-16, भाग- II, 11 अक्तूबर, 1951, पृ. 4730-37