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देता है। मैं नहीं जानता कि उन्होंने ऐसा करने से मना क्यों किया।
जब वह वक्तव्य देना चाहते थे, तब मैंने उनसे, बिना किसी शर्त के, 6 बजे अपना वक्तव्य देने को कह दिया था किंतु उन्होंने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया। इसलिए मुझे खेद है कि उन्होंने उस अवसर का लाभ नहीं उठाया। मैं इस ग़लतफ़हमी को दूर कर देना चाहता था। जब वह अपने वक्तव्य की प्रति देने के लिए खड़े हुए तो दुर्भाग्य से वह नहीं दे पाये, मैंने उससे पहले ही उनसे कहा था। वह मुझे अपने वक्तव्य की प्रति देते या न देते, मैंने उनको इस सदन में मौखिक वक्तव्य देने की अनुमति दे देनी थी। उन्होंने मेरे सुझाव को स्वीकार नहीं किया।
श्री ज्ञानी राम (बिहार) : उनका वक्तव्य समाचार-पत्रों में प्रकाशित हो चुका है।
माननीय उपाध्यक्ष : मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है। सदन उस पर कोई ध्यान नहीं देगी।
प्रधानमंत्री (श्री जवाहर लाल नेहरू) : क्या मैं इस संबंध में कुछ कह सकता हूँ। मेरे लिए यह बड़े दुःख की बात है कि मेरे एक पुराने साथी इस तरीके से हमसे आज अलग हो गए हैं। मैं उन सभी पहलुओं के संबंध में कुछ नहीं कहना चाहता जिनका आपने उल्लेख किया है। मुझे वक्तव्य की एक प्रति, जब मैं अपने स्थान पर बैठा हुआ था, प्रातः 9.30 बजे प्राप्त हुई थी अर्थात् वास्तव में वक्तव्य देने के लिये उठने से लगभग 45 मिनट पहले, मुझे उसको पढ़कर कुछ हैरानी हुई थी क्योंकि त्याग-पत्र देने वाले किसी मंत्री से मैं इस प्रकार के वक्तव्य की आशा नहीं करता। फिर भी जो सच्चाई है, वह तो है और मेरा विचार है कि जब वह वक्तव्य देंगे तो मैं कुछ शब्द कहूँगा क्योंकि नियमों के अधीन ऐसे मामले में कोई वाद-विवाद करना न तो वांछनीय होता है और न ही उसकी अनुमति दी जा सकती है, मैं, आपकी अनुमति से मुझे भेजे गये त्याग-पत्र को और इससे पहले और बाद में, एक-दूसरे को भेजे गये कुछ पत्रों को पढ़ना चाहता हूँ।
मुझे प्राप्त पहला पत्र इस प्रकार है-
डॉ. देशमुख (मध्य प्रदेश) : यदि पीठासीन अध्यक्ष की इच्छा डॉ. अम्बेडकर को एक अन्य अवसर देने की है तो मेरे विचार से प्रधानमंत्री द्वारा इस विषय पर इस समय वक्तव्य दिए जाने के बजाय अच्छा यही होगा कि प्रतीक्षा कर ली जाए कि क्या वह इस अवसर का लाभ उठाने के लिए राज़ी हैं।
ख़्वाजा इनाइत उल्लह (बिहार) : उसकी प्रति हमारे हाथों में आ चुकी है।
डॉ. देशमुख : यदि एक अन्य अवसर दिया जाना हो;