25. केन्द्रीय और राज्य कानूनों की संवीक्षा - Page 131

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पंडित एम. बी. भार्गव : क्या विधि मंत्री यह बताने की कृपा करेंगे कि क्या भारत सरकार ने कोई विधि आयोग अथवा अन्य ऐसे किसी समुचित तंत्र की स्थापना की है अथवा स्थापित करने का इरादा है जो भारत के संविधान के भाग III तथा अन्य उपबंधों के असंगत मौजूद कानूनों में भारत के संविधान की आत्मा के अनुसार संशोधन करने, परिवर्तन करने अथवा निरस्त करने संबंधी सभी केन्द्रीय और राज्य विधियों की संवीक्षा और जांच करेगा और यदि नहीं, तो क्यों?

विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर) : जी नहीं, श्रीमान्। संविधान के अनुच्छेद, 372 के अधीन केन्द्रीय और राज्य विधियों को संविधान के अनुरूप बनाने के लिए सरकार का मत है कि जहाँ तक मूल अधिकारों का सवाल है, अनुच्छेद 13(1) को ध्यान में रखते हुए किसी कानून का लोप करना अथवा उसमें किसी तरह का परिवर्तन करना तब तक उचित नहीं होता जब तक कि संविधान के भाग III के किसी उपबंध और उस कानून के बीच कोई स्पष्ट असंगतता न दिखाई दे जैसे कि, उदाहरणार्थ पंजाब लैण्ड एलिएनेशन, ऐक्ट, 1900 को अनुकूलन के द्वारा निरसित कर दिया गयाँ

पंडित एम. बी. भार्गव : क्या सरकार ने इस प्रश्न पर विचार किया है कि राज्य और केन्द्रीय कानून किस सीमा तक वर्तमान संविधान के अनुकूल हैं और क्या सरकार का प्रतिपादना पर विचार करने का इरादा है?

डॉ. अम्बेडकर : महोदय, मैं नहीं समझता कि यह ऐसा मामला है जिसे प्रश्नोŸार काल में उठाया जा सकता है। इस मुद्दे पर विभिन्न कोणों से वाद-विवाद किए जाने की आवश्यकता है, जिसे अनुच्छेद 13(1) के अनुरूप अनुच्छेद, 372 के प्रयोजन को कार्य रूप देने के लिए अंगीकष्त किया जा सकता है।

पंडित एम. बी. भार्गव : महोदय, क्या मैं जान सकता हूँ कि असंख्य कानूनों में से एक विशेष अधिनियम को ही क्यों चुना गया है और इस कानून को कौन सी

* संसदीय वाद-विवाद, खंड-7, भाग- I, 7 अप्रैल, 1951, पृ. 2820