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डॉ. अम्बेडकर : मुझे विश्वास है कि ऐसा हो जाएगा।
श्री ज्ञानी राम : मैं जानना चाहता हूँ कि क्या लोक प्रतिनिधित्व अधिनियमों का हिन्दी में अनुवाद हो गया है?
डॉ. अम्बेडकर : मैं समझता हूँ कि उनका अनुवाद हो रहा है।
श्री ए. सी. गुहा : क्या सरकार का विचार इस अधिनियमों का अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद करने का है?
श्री राजकंवर : सामान्यतया किसी अधिनियम के अंग्रेजी प्रकाशन के कितने दिनों के पश्चात् हिन्दी अनुवाद उपलब्ध हो जाता है?
डॉ. अम्बेडकर : इस मामले में ‘‘सामान्यतः’’ जैसी कोई चीज नहीं है।
श्री अमोलख चन्द : मैं जानना चाहता हूँ कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियमों का अनुवाद चुनावों के पूर्व होगा अथवा बाद में?
डॉ. अम्बेडकर : यह विभिन्न विभागों द्वारा इस कार्य को करने की क्षमता पर निर्भर करता है, लेकिन मैं समझता हूँ कि मेरे माननीय मित्र अनुमान लगा सकते हैं कि सरकार इतना तो समझती है कि चुनावों के पश्चात् उनके अनुवाद का प्रयोजन शून्य हो जाएगा।
सेठ गोविन्द दास : जहाँ तक चुनावों से संबंधित अधिनियमों का संबंध है, उनमें से कितनों का हिन्दी में अनुवाद हो चुका है, कितनों का प्रकाशन हो चुका है और कितने प्रकाशित होने शेष हैं तथा उनके कब तक प्रकाशित हो जाने की आशा हैं?
डॉ. अम्बेडकर : मेरे माननीय मित्र लोक प्रतिनिधित्व और चुनाव संबंधी अधिनियमों की बडत्री संख्या होने का अनुमान लगा रहे हैं। जबकि हमारे पास केवल दो छोटे-छोटे अधिनियम हैं जिनमें से एक का नाम है लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि.........
सेठ गोविन्द दास : जब चुनावों से संबंधित तीन ही अधिनियम हैं और उनमें भी केवल एक ही बड़ा है और दो छोटे हैं तब उनके कार्य में इतना वक्त क्यों लग रहा है?
डॉ. अम्बेडकर : क्योंकि इसके लिए केवल दो ही अनुवाद हैं।
सेठ गोविन्द दास : तब आप उनकी संख्या क्यों नहीं बढ़ाते हैं?
* संसदीय वाद-विवाद, खंड-9, भाग- I, 27 अगस्त, 1951, पृ. 664