202 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आदिवासी और लगभग 50,000 आपराधिक जातियों के लोग पैदा हुए हैं। इस सभ्यता के बारे में क्या कहा जा सकता है? जिस सभ्यता के ये परिणाम हैं, उसमें कोई मूल गलती रही होगी और मेरे विचार में अब समय आ गया है कि हिंदू लोग इस दृष्टि से इस सभ्यता को देखें कि क्या वे अपनी सभ्यता पर गर्व कर सकते हैं जिसके अंतर्गत ये समुदाय, जैसे अस्पृश्य जन आपराधिक जातियाँ और आदिवासी लोग पैदा हुए हैं। मेरे विचार में उन्हें दो बार सोचना चाहिए- दो बार ही नहीं, सौ बार वे परम्परागत रूप से सभ्य कहलाते हैं- जिन की सभ्यता के ये परिणाम निकले हैं, क्या उन्हें सभ्य कहा जा सकता है।
महोदय, यह अवसर प्रदान करने के लिये मैं आपका बहुत धन्यवाद देता हूँ।
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संविधान (तृतीय संशोधन) विधेयक, 1954
* डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बंबई) : उपसभापति महोदय, सदन में प्रस्तुत विधेयक
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में दो बातें उठाई गई हैं और यह वांछनीय है कि उन दोनों बातों पर अलग-अलग विचार किया जाए। पहला मुद्दा विधेयक के गुण-दोष से संबंधित है कि क्या इस विधेयक को गुण-दोष के आधार पर अच्छा विधेयक माना जाये, और दूसरा मुद्दा यह है कि किस तरीके से इस विधेयक को संसद से पारित करवाया जा रहा है। मैं विधेयक के गुण-दोष के बारे में कुछ कहना चाहूँगा।
यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इस विधेयक में कोई नयी बात नहीं है। इस विधेयक में समवर्ती सूची में प्रविष्टि संख्या 33 को निकाले जाने और उसके स्थान पर अनुच्छेद 369 में, वर्तमान रूप में उल्लिखित उपबंध रखने तथा उसके साथ कुछ और अर्थात् पटसन का निर्यात जोड़ने की व्यवस्था है अन्यथा उसमें कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं है और यह केवल प्रतिस्थापन का मामला है। यदि इस दृष्टि से इस विधेयक पर विचार किया जाये तो इस प्रभारी मंत्री द्वारा प्रस्तुत विधेयक पर कैसे कोई आपत्ति की जा सकती है। विवाद की एक ही बात हो सकती है कि क्या अनुच्छेद 369 के उपबंधों को राज्यसूची सूची II में रखा जाये जिससे राज्यों को पूर्ण शक्ति मिल जायेगी या क्या उनको सूची I में रखा जाए जिससे इन वस्तुओं से निपटने हेतु केन्द्रीय सरकार
* संसदीय वाद-विवाद, (राज्य सभी) जिल्द- 7 ख, 15 सितम्बर, 1954, पृ. 2297-2203