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को पूर्ण शक्ति प्राप्त हो जाए। वर्तमान स्थिति यह हैः- अनुच्छेद 369 के अनुसार इन मामलों अथवा इन वस्तुओं से निपटने के लिये इनको समवर्ती सूची में शामिल किया हुआ है। वर्तमान स्थिति यही है। समवर्ती सूची में, केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकार दोनों इस विषय में कानून बना सकती हैं। इस लिये अनुच्छेद 369 तथा प्रविष्टि 33 में परिभाषित रूप में वर्तमान स्थिति को देखते हुए हमें पता चलता है कि दोनों ने इन मामलों को समवर्ती सूची में रखा हुआ है। राज्य यह शिकायत नहीं कर सकते कि संविधान द्वारा उनको प्रदत्त कोई अधिकार क्षेत्र इस संशोधनकारी विधेयक के माध्यम से उनसे छीना जा रहा है। स्थिति बिल्कुल वैसी ही रहेगी : केवल प्रश्न यह है कि क्या अनुच्छेद 369 द्वारा केन्द्र को प्रदत्त विधायी नियंत्रण जो केवल पांच वर्षों के लिये और उससे अधिक के लिए नहीं दिया गया था- क्या वह अब अनिश्चित काल तक जारी रहना चाहिए। मेरा अपना विचार यह है कि इस मामले पर प्रशासन को निर्णय करना चाहिए कि क्या जिन परिस्थितियों में वे अब रह रहे हैं, वे इतनी बदल गयी हैं कि इन मदों पर विधान बनाने की जो शक्ति संसद को पांच वर्ष के लिये दी गयी थी उसको समाप्त कर दिया जाना चाहिए। इस विषय में मेरा अपना विचार यह है कि मैं प्रशासन के निर्णय को स्वीकार करने के लिये तैयार हूँ क्योंकि वे एक सांसद से कहीं बेहतर निर्णय कर सकते हैं। इसलिये जहाँ तक विधेयक के गुण-दोष का सम्बन्ध है, मैं इसका समर्थन करता हूँ।
इस विधेयक पर बोलते हुए इसके प्रभारी मंत्री महोदय ने राज्यों के साथ विचार-विमर्श करने का कुछ हवाला दिया था। मैंने उन्हें यह कहते हुए सुना था कि उन्होंने विभिन्न राज्यों में संबद्ध विभागों से विचार-विमर्श किया था और यह विचार-विमर्श, जहाँ तक मैं उनकी टिप्पणी से समझ पाया हूँ महज दिखावा मात्र था। मेरे विचार में यह बहुत गंभीर बात है और इसका सीधा कारण यह है कि यह विधेयक केवल दो सदनों के मतों के आधार पर कानून बनाने वाला नहीं है। कानून बनने से पहले इस विधेयक को और भी प्रक्रिया से गुजरना होगा। इस संबंध में मैं माननीय प्रभारी मंत्री का ध्यान अनुच्छेद 368 की ओर दिलाना चाहता हूँ विशेषकर परन्तुक के खण्ड (ग) की ओर जिसमें लिखा है ‘‘परन्तु यदि ऐसा संशोधन... कोई बदलाव करने वाला हो। (ग) सातवीं अनुसूची में किसी सूची में कोई बदलाव कोई परिवर्तन करने के लिए है, ऐसे संशोधन के लिये उपबंध करने वाला विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष अनुमति हेतु प्रस्तुत किए जाने से पहले उस संशोधन के लिए कम से कम आधे राज्यों को उन विधान मंडलों द्वारा पारित इस आशय के संकल्प द्वारा उन विधानमंडलों, जो प्रथम अनुसूची के भाग क और ख में विहित आधे राज्यों से कम न हो, का अनुसमर्थन भी अपेक्षित होगा। इसलिये यह वैसे ही संशोधनों में से एक है....