206 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाना चाहिए क्योंकि ऐसी स्थितियाँ पैदा हो सकती हैं जिनमें संविधान में संशोधन करने की आवश्यकता पड़ सकती है ओर आप ऐसा नहीं कर सकते कि आवश्यक सामाजिक समस्याओं का समाधान करने के लिये संविधान में कोई समाधान ही न मिले। इसी कारण यह प्रस्ताव किया गया था कि अनुच्छेद 368 के उपबंध ऐसी स्थिति के लिये पर्याप्त होंगे। हमें कुछ मामलों को छोड़कर राज्यों के पास जाने अथवा मतदाताओं के पास जाने की आवश्यकता नहीं है किन्तु मेरे मन में लेश मात्र भी संदेह नहीं है कि संविधान के निर्माण से संबंधित किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं सोचा था कि सरकार मतदाताओं को कोई जानकारी दिये बिना एकदम, संविधान का संशोधन करने लगेगी। मैं निवेदन करना चाहता हूँ, कि राजनीतिक जीवन और पार्टी के हित के लिये मतदाताओं को जानकारी देना एक सामान्य सिद्धांत है। इंग्लैण्ड में भी कोई भी पार्टी किसी ऐसे विधान पर काम नहीं करेगी जो चुनाव के लिये उसके राजनीतिक कार्यक्रम का अंग न हो। प्रत्येक पार्टी के पास कोई काम करने के लिए जनादेश अवश्य होना चाहिए। आप मतदाता को आश्चर्य में नहीं डाल सकते और आप यह भी नहीं सोच सकते कि चूंकि आप निर्वाचित है इसलिए आपको संविधान में संशोधन करने का पूरा अधिकार मिल गया है। हमारी सरकार बिल्कुल ऐसा ही व्यवहार कर रही है। चूंकि उनको बहुमत मिल गया है, वे सोचते हैं कि वे कोई भी कानून, किसी भी प्रविष्टि के संबंध में जो उनको कानून बनाने का अधिकार देती है, न केवल बना सकते हैं बल्कि उनके पास, केवल निर्वाचित होने की हैसियत से ही जनता को अपना इरादा बताये बिना संविधान का संशोधन भी कर सकते हैं। क्या संविधान किसी साधारण कानून के किसी भी रूप में भिन्न नहीं हैं? क्या यह कागज़ का एक टुकड़ा मात्र है जिसमें कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से संशोधन कर सकता है। मराठी में एक कहावत है-मैं नहीं जानता कि मैं उसका अंग्रेजी में ठीक अनुवाद कर सकता हूँ या नहीं-और वह कहावत बहुत अच्छी है और वह बहुत उपयुक्त है। हम कहते हैं कि यदि कोई वृद्धा मर जाए तो उससे वास्तव में कोई अन्तर नहीं पड़ता परन्तु हम इस बात से डरते हैं कि यमराज को हमारे घर आने की आदत पड़ जाएगी और हम यमराज के आक्रमण को रोकना चाहते हैं। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता यदि कोई वृद्धा मर जाती है या चली जाती है। वास्तव में यहाँ वही हो रहा है और मैं देख रहा हूँ कि सरकार के मन में संविधान के लिये आदर नहीं है या बहुत कम आदर है। आप संविधान में संशोधन कर सकते हैं, इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है लेकिन आपको निश्चय ही संविधान को बेहतर और विशेष दर्जा देना चाहिए। आपको अपने इरादे के बारे में जनता को जानकारी देनी चाहिए और तत्पश्चात् आप संशोधन कीजिए अन्यथा अनावश्यक रूप से संवैधानिक उपबंध लगाये जाने के अभ्यास को रोकने के लिए अनुच्छेद 368 में संशोधन करना आवश्यक हो जाये। बस, मुझे इतना ही कहना है।
*****