अस्पश्श्यता अपराध विधेयक 1954 - Page 224

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अस्पश्श्यता अपराध विधेयक 1954

* डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बंबई) : उप-सभापित महोदय, मैं इस विधेयक पर बोलना चाहता हूँ। इस विधेयक पर चर्चा के दौरान मेरे लिये चुप रहना असंभव है। परन्तु मैं देखता हूँ, कि मेरे माननीय मित्र प्रभारी मंत्री ने मुझे इस विधेयक को संबंधित प्रवर समिति में रखने की इजाजत दी है। यह एक परम्परा है जो सदस्य प्रवर समिति में हैं वे प्रवर समिति को भेजे जाने वाले प्रस्ताव पर वाद-विवाद में भाग नहीं लेगा। मैं नहीं जानता कि इस नियम का कहाँ तक सख्ती से पालन किया जाता रहा है।

माननीय उप सभापति : इसका उल्लंघन नहीं किया गया है।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : दूसरे सदन में इसका सख्ती से पालन नहीं किया गया और मुझे पता चला है कि ऐसी स्थिति में कोई सदस्य सदन में अपने विचार रख सकता है। फिर भी, यदि यहाँ परम्परा का सख्ती से पालन किया जाता हो तो मैं अपना नाम वापिस लेने के लिये अनुमति चाहता हूँ और मुझे आशा है कि मंत्री महोदय मेरा अनुरोध स्वीकार कर लेंगे।

प्रो. एन. जी. रंगा (आंध्र) : यह परम्परा कठोर नहीं है।

माननीय उपसभापति : यह कठोर है और हम इसका पालन करते रहे हैं।

प्रो. एन. जी. रंगा : यदि निर्धारित समय के भीतर ..................

माननीय उपसभापति : ऐसा करने से गलत दृष्टांत स्थापित हो जायेगा।

प्रो. एन. जी. रंगा : इसमें गलत दष्ष्टांत की कोई बात नहीं हैं। मैंने तो हमेशा यही समझा है कि जब दूसरे सदस्य जो प्रवर समिति के सदस्य नहीं होते और बोलने के लिये तत्पर होते हैं, तब उन सदस्यों से जो प्रवर समिति के सदस्य होते हैं आशा की जाती है कि वे अन्य सदस्यों को बोलने दें परन्तु इससे प्रवर समिति के किसी सदस्य को बोलने के अपने विशेषाधिकार से वंचित नहीं किया जाता। यदि...

माननीय उपसभापति : हम इस परंपरा का निर्वाह करते रहे हैं कि प्रवर समिति के सदस्य.......................

* संसदीय वाद-विवाद, (राज्य सभी) जिल्द- 7 ख, 16 सितम्बर, 1954, पृ. 2417-18