208 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रो. एन. जी. रंगा : हमने इस रूप में इसका पालन नहीं किया है। यह कोई नियम नहीं, परम्परा है।
माननीय उपसभापति : परम्परा का अर्थ इसी रूप में लगाया जाना चाहिए क्योंकि उसका पालन इसी रूप में किया जाता रहा है।
प्रो. एन. जी. रंगा : इस सम्बन्ध में कोई निश्चित नियम नहीं है। परन्तु हम जिस परंपरा का अनुसरण करते रहे हैं वह यह है कि सामान्य रूप से वे सदस्य, जो प्रवर समिति के सदस्य होते हैं, यहाँ नहीं बोलते।
माननीय उपसभापति : पिछले दो या तीन अवसरों पर मैंने सदस्यों को बोयलने से मना किया है।
श्री विश्वनाथ दास (उड़ीसा) : चूंकि उनको प्रवर समिति के समक्ष अपने विचार रखने का अवसर मिलता है, इसलिये यह वांछनीय नहीं समझा जाता कि उनको यहाँ भी आवश्यक.....
माननीय उप सभापति : इससे गलत दृष्टांत स्थापित होगा।
श्री विश्वनाथ दास : इसलिये जो प्रवर समिति के सदस्य नहीं होते, उनको अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है जिससे प्रवर समिति उनके विचारों का भी लाभ उठा सके। मेरा निवेदन है कि ऐसा कोई नियम नहीं है और हमें कोई ऐसी कठोर परम्परा भी नहीं बनानी चाहिए कि प्रवर समिति के सदस्यों को बोलने से बिल्कुल मनाही हो। अतः मैं अपने माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर से अनुरोध करूंगा कि वे इस बात को इसी दृष्टि से देखें और प्रवर समिति से अपना नाम वापिस लेने पर विचार करें जो, मेरे विचार में अधिक उपयोगी और सहायक होगा।
* डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : उप-सभापित महोदय, मैं इस विधेयक के उपबधों पर वास्तव में कुछ कहने से पूर्व यह वांछनीय समझता हूँ कि मैं संविधान के कुछ अनुच्छेदों में उल्लिखित जिम्मेदारी और उन प्रावधानों को क्रियान्वित करने के लिये सरकार पर डाली गयी जिम्मेदारी की ओर सदन का ध्यान आकृष्ट करूं।
मैं पहले संविधान के अनुच्छेद 13 का हवाला देना चाहता हूँ। अनुच्छेद 13 में लिखा है कि वे सभी विधियाँ जो मूल अधिकारों से असंगत हैं, संविधान के अस्त्तिव में आने की तारीख से शून्य हो जाएंगी। यह एक सामान्य प्रावधान है जो अनुच्छेद 13 में उल्लिखित है। यह वास्तव में, जनता को तथा न्यायालय के न्यायाधीशों को सूचना है कि यदि उन के समक्ष कोई ऐसा मामला उठाया जाता है तो मूलभूत
* संसदीय वाद-विवाद, (राज्य सभी) जिल्द- 7 ख, 16 सितम्बर, 1954, पृ. 2424-66