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अधिकारों के न्याय-निर्णय से संबंधित हो तो न्यायालय ऐसे किसी विद्यमान कानून को प्रभावी नहीं करेगा जो मूल अधिकारों के विरुद्ध हैं। लेकिन संविधान के निर्माता इस सामान्य उद्घोषणा से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि उन्होंने महसूस किया है कि एक आम आदमी से आशा नहीं की जा सकती कि वह अपने मूल अधिकारों के उल्लंघन के मामले को न्यायालय में ले जाये और वहाँ से न्याय प्राप्त करे। आम नागरिक पर इतना बोझ डालना उचित नहीं समझा जाता इसलिये संविधान में एक अन्य अनुच्छेद -अनुच्छेद 372, खण्ड (2) रखा गया जो मूल अधिकारों के साथ एकरूपता लाने के विचार से विद्यमान विधियों में उपांतरण करने और अनुकूलन करने के लिये सरकार को शक्ति प्रदान करता है।
यदि मेरे माननीय मित्र मुझे एक निजी बात कहने का अवसर दें तो मैं यह कहूँगा कि जब विधि विभाग मेरे अधीन था तब मैंने मूल अधिकारों के साथ एकरूपता लाने के लिये विद्यमान विधि के उपांतरण और अनुकूलन का मामला उठाया था। मैं पंजाब में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विधान को निरस्त कराने में सफल भी हो गया था। उसका नाम था पंजाब लैंड एलाइनेशन एक्ट जिसके अधीन कुछ समुदाय अथवा विधि की शब्दावली के अनुसार यह घोषणा कर दी गयी थी कि केवल कुछ जनजातियाँ ही पंजाब में संपत्ति रख सकती हैं या खरीद सकती हैं। मेरे निर्णय में वह कानून इतना अन्याय करने वाला था कि वह व्यक्ति जो वास्तव में किसान था लेकिन जिसके समुदाय व जनजाति को सरकार द्वारा खेतिहर जनजाति घोषित नहीं किया था वह भूमि रखने का हकदार नहीं है। लेकिन कोई अन्य व्यक्ति जो पूरा जीवन बैरिस्टर रहा और निचले स्तर पर खेती करने की कभी उम्मीद तक नहीं की, वह संपत्ति
खरीदने का हकदार बन गया क्योंकि सरकार ने उसकी जाति को खेती करने वाली जनजाति घोषित कर दिया था। मैंने अनुच्छेद 372, खण्ड (2) के प्रावधानों के अन्तर्गत उस पूरे अधिनियम को रद्द करवा दिया। उस समय एक अन्य कानून या प्रथा विद्यमान थी जो पंजाब लैंड एलीअनेशन के एक्ट के साथ थी और जिसमें संयुक्त भूमि का उल्लेख था अर्थात् ऐसी भूमि जो गांव वालों की शामिलात थी। रूढि़जन्य पंजाब के कानून के अधीन शामिलात भूमि में उन्हीं समुदायों का हिस्सा हो सकता था जिनको जमींदार कहा जाता था, वंशानुगत भूमि के स्वामी समुदाय। दूसरे लोग वे थे जो जमींदार नहीं थे उनको कमीनास कहा जाता था अर्थात् वे लोग छोटी जाति के होते थे और उनको उस भूमि में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं था। इसके परिणामस्वरूप वह उस भूमि पर पक्का मकान नहीं बना सकते थे जिस पर वे रहते थे। उनको सदा इस बात का भय रहता था कि कहीं पंजाब का जमींदार उनको वहाँ से निकाल न दे। लोग वहाँ पक्के मकान बनाने की हिम्मत नहीं करते थे। जब मैंने यह विधि विभाग छोड़ा था तब मैं वहाँ पर एक टिप्पणी लिखकर छोड़ आया था कि