अस्पश्श्यता अपराध विधेयक 1954 - Page 228

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है या अपनी नौकरी छोड़ता है, तो वह दंड का भागी होगा और उसे दो महीने तक का कारावास का दंड मिल सकता है। मेरे विचार में, ये विधियाँ बिल्कुल बेहूदा हैं। आजकल विश्व में कोई भी देश सेवा की संविदा के उल्लंघन को कोई ऐसा अपराध नहीं मानता जिसके लिये कारावास का दंड दिया जाये या जुर्माना लगाया जाए। यह हानिकारक है फिर भी इसके बारे में कुछ नहीं किया गया है।

तत्पश्चात् मैं तीन अन्य अधिनियमों का उल्लेख करना चाहता हूँ। उनमें से एक है 1874 का बम्बई हेरिडेटरी विलेज आफिसर्स एक्ट। इस अधिनियम के अधीन जो कार्य करते हैं अथवा स्थानापन्न रूप में काम करते हैं, उनको दो श्रेणियों में विभक्त किया गया है। मेरे मित्र श्री ढागे इससे भली-भांति परिचित होंगे, यद्यपि गृह मंत्री स्वयं शायद परिचित न हों। मुझे पता नहीं कि उनके प्रान्त में कौन-सी प्रणाली प्रचलित है। परन्तु वहाँ कर्मचारियों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। एक वर्ग को अधिकारी कहा जाता है और दूसरे वर्ग को ग्राम कर्मचारी कहते हैं। यद्यपि दोनों वर्गों को पुराने तरीके से भुगतान किया जाता है अर्थात् उनको सेवा के लिये भूमि दी जाती है और उसमें से उनको अपनी आमदनी भी निकालनी होती है। प्राचीन काल में संभवतः शिवाजी के समय अथवा पेशवाओं के शासन काल में यह भूमि उनको दी गयी थी। उस समय दी गयी भूमि में किसी प्रकार की कोई वृद्धि नहीं की गयी है। वे उस भूमि को कांट-छांट कर हिस्से करते रहे हैं। और अब किसी एक व्यक्ति के पास एकड़ भूमि के 100वें हिस्से से अधिक भूमि नहीं होगी। फिर भी ये निर्धन लोग उस भूमि से चिपके बैठे हैं। जब अंग्रेज लोग भारत में आये तो उन्होंने प्रतिस्थापन नामक एक योजना प्रारम्भ की अर्थात् वंशानुगत सेवा के कर्तव्य से किसी व्यक्ति को मुक्त करना और उसको भूमि रखने की अनुमति देना बशर्ते कि वह ‘जुड़ी’ अथवा भू-राजस्व, जितना सरकार उचित समझे, देने के लिये तैयार हों। अनिश्चितकाल तक वही योजना चलती रही और अनेक आनुवंशिक पदाधिकारी अब तक कार्य मुक्त कर दिये गये। हाल ही में बम्बई प्रशासन ने गांव के आनुवंशिक अधिकारियों के अग्रेतर प्रतिस्थापन का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया है परन्तु बम्बई राज्य में अनुसूचित जातियों की इस निरन्तर मांग के बावजूद कि उनके कर्मचारियों व आनुवंशिक अधिकारियों का भी प्रतिस्थापन किया जाना चाहिए जिससे वे भी सेवा के कर्तव्य से मुक्त हो जायें और उनकी भी भू-राजस्व का भुगतान करके भूमि रखने की अनुमति मिल जाये-वे बहुत उदार थे और पूरा भू-राजस्व देने को तैयार थे और किसी प्रकार की कोई छूट नहीं चाहते थे - बम्बई प्रशासन ने उनके अनुरोध को ठुकरा दिया। वे अपने कानून को उन अधिकारियों तक सीमित रखना चाहते हैं जो अनुसूचित जाति के नहीं हैं। मैं अपने अनुभव से यह बात कहता हूँ कि यह कानून बहुत ही बर्बरतापूर्ण है, क्योंकि यह गांव के पटेल, जो इस अधिनियम