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जा सकेगा और न्यायालय उस मामले में तब तक कुछ नहीं कर सकेगा जब तक वह कलेक्टर से यह प्रमाण-पत्र न प्राप्त कर ले कि न्यायालय उस मामले पर विचार करें। इसलिये इन गरीब लोगों के लिये इस अधिनियम विशेष के अधीन किये जा रहे अनेक अन्यायों का कोई समाधान करा पाना बिल्कुल असंभव है। यदि मैं विधि मंत्री रहता तो मेरा इरादा यह सुधार करने का था परन्तु मेरे विचार में किसी भी विधि मंत्री का और विशेषकर गृह मंत्री का यह कर्तव्य है कि वह इन कानूनों की छानबीन करे और पता लगाये कि वे मूल अधिकारों के कहाँ तक विरुद्ध हैं। महोदय, मुझे खेद है कि ये विभाग आलस्य से भरपूर हैं। इस मामले पर विचार करने के लिये उनमें न कोई उत्साह है न कोई प्रेरणा। उनमें आदर्शवाद का मुद्दा नहीं है। मैं आशा करता हूँ कि मैंने जो कुछ कहा है, उसके बाद उनके मन में इस मामले में कुछ करने की इच्छा जागृत होगी और वे इस बात को सुनिश्चित करें कि जहाँ आवश्यक है उनको राहत दी जाये। महोदय, प्रारंभिक टिप्पणी के रूप में मुझे इतना ही कहना था। अब मैं, स्वयं विधेयक पर अपने विचार रखूंगा।
मैं विधेयक के नाम के बारे में कुछ कहना चाहूँगा। यह अधिक महत्वपूर्ण बात तो नहीं है परन्तु मेरे विचार में नाम से अन्तर पड़ता है। शेक्सपियर ने कहा है कि गुलाब की सुगन्ध मीठी होती है, चाहे उसका नाम गुलाब या कोई और हो। मैं शेक्सपियर की इस बात से सहमत नहीं हूँ। मेरे विचार में नाम का बहुत महत्व होता है और मेरे विचार में किसी अच्छे कानून का नाम अच्छा और संक्षिप्त होना चाहिए। इस विधेयक का नाम क्या है? ‘‘अस्पृश्यता का व्यवहार करने अथवा उससे उत्पन्न किसी अशक्त्ता के प्रवर्तन के लिए दंड की व्यवस्था वाला विधेयक’’, मेरे विचार में यह बहुत भद्दा नाम है और शब्द बहुत बड़े हैं। इस विधेयक का सही नाम क्या होना चाहिए, इसके बारे में विवाद हो सकता है। मेरे निजी विचार हैं कि इसका नाम ‘‘नागरिक अधिकार (अस्पृश्य) संरक्षण अधिनियम’’ होना चाहिए। आखि़र आप उनके नागरिक अधिकारों का संरक्षण करने से अधिक तो कुछ नहीं कर रहे हैं। इसलिये नागरिक अधिकारों पर ही जोर दिया जाना चाहिये। मैं इस विधेयक के प्रभारी अपने माननीय मित्र से कहना चाहूँगा कि यदि अमरीका में हब्शियों के संबंध में ऐसे मामले का उल्लेख किया जाता या ‘सिविल बार’ का उल्लेख किया जाता तो उनको पता चलता कि जो विधेयक वे अब संसद से पास करवाना चाहते हैं, वह अमरीका में पहले ही पास हो जाता है फिर जिस विधेयक का उल्लेख किया जाता, तो वह नागरिक अधिकार संरक्षण विधेयक कहलाता। इस में ‘हब्शी’ नाम का उल्लेख नहीं है। मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि वह बार-बार अस्पृश्यता अथवा अस्पृश्य शब्दों को क्यों दोहराते हैं। विधेयक के पाठ में उन्होंने अनुसूचित जाति शब्द का उल्लेख किया है। संविधान में भी अनुसूचित जाति शब्द का ही प्रयोग किया गया है। और पता नहीं विधेयक के नाम में अनसूचित जाति शब्द का प्रयोग करने में उनको