अस्पश्श्यता अपराध विधेयक 1954 - Page 231

214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

क्यों संकोच है। मेरा निजी विचार यह है कि यदि इस विधेयक का नाम अस्पृश्य नागरिक अधिकार संरक्षण विधेयक अथवा अनुसूचित जाति नागरिक अधिकार संरक्षण विधेयक रखा जाये तो मुझे बहुत प्रसननता होती। मैं आशा करता हूँ कि मेरे मित्र इस पर विचार करेंगे।

अब, महोदय, मैं विधेयक में कुछ भयंकर भूलों की ओर सदन का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ। वास्तव में नागरिक और संवैधानिक अधिकारों के प्रयोग में आने वाली किसी बाधा को दूर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। निःसंदेह, विधेयक का अंतिम परिणाम नागरिक और संवैधानिक अधिकारों के प्रयोग की स्वतंत्रता होगी परन्तु मैं व्यक्तिगत रूप से सोचता हूँ कि बहुत अच्छा होता यदि मेरे मित्र स्पष्ट रूप से लिख देते कि विधेयक का उद्देश्य किन्हीं नागरिक व संवैधानिक अधिकारों के प्रयोग में आने वाली बाधाओं को दूर करना है। अमरीका के सिविल राइट्स बिल में से मैं एक उपबन्ध पढ़ कर सुनाता हूँ। इस उपबंध में लिखा है- पुस्तक के नाम वाले पृष्ठ को मत पढि़ए- इससे आपको दुःख पहुंचेगा। यह गवर्नमेंट आफ आयरलैंड एक्ट, 1920 और प्रोफेसर कीथ के कमांड पेपर से लिया गया यूनाइटेड स्टेट्स कांस्टीट्यूशन अमेंडमेंट XIV से लिया गया है। उस उपबन्ध में यह लिखा है। अस्पृश्य जनों पर लागू करने योग्य बनाने हेतु मैंने इसमें कुछ बदलाव किया है परन्तु इसका मूल पाठ सिविल राइट्बिल के पाठ में से लिया गया है :

‘‘देश के सभी नागरिक विधि के समक्ष समान हैं और सबके समान नागरिक अधिकार हैं। कोई भी विद्यमान अधिनियम, विनियम, आदेश, रीति-रिवाज अथवा विधि की व्याख्या जिससे-अस्पृश्यता के कारण राज्य के किसी भी नागरिक पर कोई जुर्माना, अहित, निर्योग्यता अथवा भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है तो उसका प्रवर्तन उस दिन से समाप्त हो जाएगा जिस दिन से यह संविधान लागू होता है।’’

मेरे विचार से इस प्रकार का स्पष्ट वक्तव्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी। निसंदेह अनुच्छेद 13 में इस बात का प्रावधान है, परन्तु इससे कोई हानि नहीं कि पूरे अनुच्छेद 13 को आवश्यक संशोधनों सहित दुबारा लिख दिया जाता। मुझे इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि विधेयक में इस बात का उल्लेख क्यों नहीं है। विधेयक से ऐसा आभास होता है कि यह विधेयक साधारण किस्म का है वैसे ही जैसे धोबी कपड़े नहीं धोता, नाई दाढ़ी नहीं बनाता, मिठाई वाला लड्डू नहीं बेचता आदि-आदि। लोग सोचते होंगे कि ये कितनी मामूली बातें हैं और संसद ने इतना कष्ट क्यों किया कि वह अपना समय धोबी, नाई और लड्डू वाले से निपटने में लगा रही है। यह विधेयक वैसा नहीं है। यह वह विधेयक है जो नागरिक मौलिक अधिकारों के संबंध में संरक्षण प्रदान करने वाला है। इसलिए मेरा निवेदन है कि