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इसमें स्पष्ट धारा जोड़ी जानी चाहिए जो वर्तमान विधेयक में नहीं है। अतः यह प्रथम मूल है जिसका सुधार किया जाना आवश्यक है। दूसरी मूल जिसे मैं भयंकर भूल मानता हूँ वह सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध कोई उपबंध सम्मिलित न किए जाने से संबंधित है। मैं अपने अनुभव के आधार पर महसूस करता हूँ कि अनुसूचित जातियों को अपने इन अधिकारों के प्रयोग से रोकने के लिए गांवों के समुदाय जिस सब से बड़े और घृणित माध्यम का उपयोग करते हैं वह है सामाजिक बहिष्कार। वे उनका पूरी तरह बहिष्कार कर देते हैं। यह असहयोग का ही दूसरा रूप है। यह केवल मेरा मत नहीं है बल्कि यह उस समिति का मत है जो अनुसूचित जातियों, दलित जातियों व आदिवासी कबीलों की स्थिति की जांच करने के लिए बंबई सरकार द्वारा नियुक्त की गई थी, मैं सदन को बताना चाहूँगा कि ठक्कर बापा इस समिति के सदस्य थे और उन्होंने इस प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर किये थे। मैं उस प्रतिवेदन से केवल एक पैरा पढूंगा जो सामाजिक बहिष्कार से संबंधित है। यह पैराग्राफ संख्या 102 है। उसमें समिति ने यह लिखा हैः
‘‘यद्यपि हमने सार्वजनिक उपयोगिता की सभी वस्तुओं के संबंध में जातियों को उनके अधिकार दिलाने के लिये अनेक उपायों की सिफारिश की है, तथापि हमें इस बात की आशंका है कि उनका उपयोग करने की मांगों में अभी बाकी समय तक कठिनाइयाँ आयेंगी। सब से पहली कठिनाई, जिसकी आशंका है, यह है कि रूढि़वादी वर्ग उनके विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही कर सकता है। इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि प्रत्येक गांव में अनुसूचित जातियों की संख्या बहुत कम होती है जबकि रूढि़वादी लोगों की संख्या बहुत अधिक होती है जो किसी भी कीमत पर दलित वर्गों के किसी भी संभावित आक्रमण से अपने हितों के सम्मान की रक्षा करने के लिये तैयार रहते हैं। पुलिस द्वारा मुकदमा चलाये जाने के ख़तरे के कारण रूढि़वादी लोगों की संख्या बहुत अधिक होती है जो किसी भी कीमत पर दलित वर्गों के किसी भी संभावित आक्रमण से अपने हितों के सम्मान की रक्षा करने के लिये तैयार रहते हैं। पुलिस द्वारा मुकदमा चलाये जाने के ख़तरे के कारण रूढि़वादी वर्ग हिंसा का मार्ग अपनाने में संकोच करते हैं और इसीलिये इस तरह के मामले बहुत कम होते हैं। दूसरी कठिनाई आर्थिक स्थिति से पैदा होती है जिस से दलित वर्ग पीडि़त रहता है। प्रेसीडेंसी के अधिकांश भागों में दलित जातियाँ आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र नहीं हैं। कुछ लोग रूढि़वादी जातियों के लोगों की भूमि पर आसामियों के रूप में काम करते हैं जो उन लोगों की इच्छा पर होता है। कुछ अन्य रूढि़वादी जातियों के लोगों द्वारा खेतिहर मजदूर के रूप में नियुक्त किये जाते हैं और वे उसी आय पर अपना भरण-पोषण करते हैं और शेष, रूढि़वादी जातियों द्वारा ग्राम-सेवक के रूप में की गयी सेवाओं के बदले दिये गये खाद्यान से गुजारा चलाते हैं। हम ने