216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ऐसी अनेक घटनाएं सुनी हैं जिनमें रूढि़वादी जातियों ने गांवों में दलित जातियों के विरुद्ध अपनी आर्थिक शक्ति का हथियार के रूप में उपयोग किया है। जब दलित जातियों ने अपने अधिकार का प्रयोग करने की हिम्मत दिखाई तो उनको अपनी जमीन से बेदखल करवा दिया, उनका रोजगार समाप्त कर दिया और ग्राम-सेवक के रूप में उनकी परिलब्धियों को भी बंद कर दिया। ऐसे बहिष्कार की योजना बहुत बड़े पैमाने पर बनायी जाती है कि जिन मार्गों से अन्य समुदाय आते-जाते हैं, उधर से दलित वर्ग के लोग नहीं जा सकते और गांव का बनिया उनको जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएं देना भी बन्द कर देता है। साक्ष्य के अनुसार दलित जातियों के विरुद्ध सामाजिक बहिष्कार की घोषणा बड़े मामूली कारणों से कर दी जाती है। अनेक बार दलित जातियों द्वारा सांझे कुंए के उपयोग को लेकर सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर दी जाती है परन्तु ऐसे साधारण कारणों के मामले भी बहुत मिल जाते हैं जब घोर बहिष्कार की घोषणा कर दी जाती है। जैसे किसी दलित जाति के व्यक्ति ने यज्ञोपवीत पहन लिया, कोई भूमि खरीद ली। अच्छे कपड़े या आभूषण पहन लिये, या किसी सार्वजनिक मार्ग से दूल्हे की घोड़ी पर बिठा कर बारात ले गये। दलित वर्ग के दमन के लिये सामाजिक बहिष्कार से अधिक किसी कठोर हथियार को हम नहीं जानते हैं। इसके सामने हिंसा का मार्ग भी फीका पड़ जाता है क्योंकि इसका दूरगामी और होश उड़ाने वाला प्रभाव होता है। यह अधिक खतरनाक है क्योंकि यह विधि सम्मत है और संविदा की स्वतंत्रता के सिद्धान्त के अनुरूप है। हम इस बात पर सहमत हैं कि बहुसंख्यकों का यह अत्याचार सख्ती से कुचल दिया जाना चाहिए। बशर्तें कि हम दलित जातियों को उनके उत्थान के लिये आवश्यक कार्यवाही करने और बोलने की स्वतंत्रता की गारंटी दे सकें।’’
यह उस समिति का निष्कर्ष है जो अनुसूचित जातियों की स्थिति पर विचार करने के लिये विशेष रूप से नियुक्त की गई थी। सामाजिक बहिष्कार के इस मुद्दे से निपटने के लिये इस विधेयक में कोई व्यवस्था नहीं है।
मैं माननीय सदस्य का ध्यान वर्ष 1922 के बर्मा एन्टी बायकाट एक्ट की ओर दिलाना चाहता हूँ, यदि वे समझें कि स्पष्ट शब्दों में इस मामले को रखना कठिन काम है जिसको न्यायालयों में कानूनी तरीके से प्रयोग में लाया जा सके तो मेरा सुझाव यह है कि 1922 के बर्मा एन्टी बायकाट एक्ट में उल्लिखित उपबंधों की प्रतिलिपि तैयार की जा सकती है। इससे हमें बहुत ही कठिन विषय अर्थात् सामाजिक बहिष्कार की बहुमूल्य परिभाषा मिल जाएगी। वह उस अधिनियम की धारा 2 में दी गयी है। बर्मा के इस अधिनियम में सामाजिक बहिष्कार को ही अपराध नहीं माना गया अपितु सामाजिक बहिष्कार के लिये उत्तेजित करना भी अपराध करार दिया गया है। वकील जिसे शैली में जितना सही शब्दों का प्रयोग करना चाहें, उस में सामाजिक बहिष्कार