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की धमकी देना भी अपराध माना गया है। मेरे माननीय मित्र ने एक हिंदू के बचाव हेतु जो अस्पृश्यता का व्यवहार नहीं करना चाहता था परन्तु उसकी जाति के लोग उसको ऐसा करने के लिये विवश करते थे, इसके विकृत अर्थ के विचार से परिवर्तन करने हेतु, धारा 8 की उप-धारा (2) का प्रयोग किया है। मेरे विचार में दो तरीकों से ऐसा कर सकते हैं-एक तो उसके विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही करके अथवा उसका सामाजिक बहिष्कार करके। जैसाकि समिति ने बताया है कि गांव के समुदाय प्रायः सामाजिक बहिष्कार के मार्ग को हिंसात्मक कार्यवाही की अपेक्षा तरजीह देते हैं क्योंकि यह काम पर्दे के पीछे से होता है और संविदा कानून की शर्तों के बिल्कुल अनुरूप रहता है जबकि हिंसात्मक कार्यवाही को भारतीय दंड संहिता के अधीन अपराध माना जाता है। इसलिये इधर-उधर की बातों के और ऊल-जलूल परिणाम प्राप्त करने के बजाय सीधा मार्ग क्यों न अपनाया जाये और सामाजिक बहिष्कार को, अनुसूचित जातियों को अपने अधिकारों का उपयोग न करने के लिये विवश करने वाला अवैध माध्यम क्यों न मान लिया जाये? आखिरकार सामाजिक बहिष्कार पर क्या आपत्ति हो सकती है? मेरा मत है कि कानूनी शब्दावली में सामाजिक बहिष्कार एक षड्यंत्र से कम नहीं होता जो भारतीय दंड संहिता के अधीन अपराध माना गया है। यदि दो व्यक्ति परस्पर मिल कर तीसरे व्यक्ति के साथ कोई अन्याय करते हैं तो यही षड्यंत्र होता है। यह सामाजिक बहिष्कार अधिकांश लोगों की सहमति के साथ किया जाता है और यह षड्यंत्र होता है और इसको अपराध माना जाता है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि मेरे माननीय मित्र इस महत्वपूर्ण बात को क्यों भूल गये।
तीसरी भूल-पता नहीं, यह भूल है या नहीं-आप मेरी गलती को सुधार सकते हैं। मैं चाहता था कि विधि मंत्री यहाँ उपस्थित होते क्योंकि यह निपट कानूनी मामला है, परन्तु निःसंदेह गृह मंत्री भी पहले विधि मंत्री रह चुके हैं और वे वकालत करते रहे हैं और मैं जो कुछ कहने जा रहा हूँ वे उससे अपरिचित नहीं हो सकते। अब प्रश्न यह है, मैं अपने आपसे पूछता हूँ कि ये अपराध क्षम्य है अथवा अक्षम्य जो इस विधेयक में शामिल किये गये हैं। क्योंकि इस विधेयक में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है उसमें कुछ नहीं लिखा है। पिछले दिन जब हम अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयुक्त के प्रतिवेदन पर चर्चा कर रहे थे, माननीय सदस्यों को स्मरण होगा कि आयुक्त ने इस बात की ओर विशेष रूप से ध्यान दिलाया था कि अस्पृश्य लोग उन पर अत्याचार करने वालों पर मुकदमा नहीं चला सकते क्योंकि वे आर्थिक रूप से अक्षम हैं और इसीलिये वे अपराधियों के साथ समझौता करने को तैयार रहते हैं, जब कभी अपराधी समझौता करना चाहते हैं। सच यह है कि कानून अशक्त है और जिनके पक्ष में वह बनाया गया है वे उसको कार्यरूप दे नहीं सकते और जिनके विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये इसको बनाया गया है वे पीडि़त व्यक्ति