अस्पश्श्यता अपराध विधेयक 1954 - Page 235

218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को शांत कराने में समर्थ हैं। अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जन-जाति आयुक्त का यह निष्कर्ष था। ऐसी स्थिति को सहन नहीं किया जा सकता है। यदि दोषी व्यक्ति को अपराध के लिए दंड दिलाना है तो अपराध को शमनीय नहीं बताया जाना चाहिए। यदि दोषी लोग कुछ रकम दे कर या वैसा ही कुछ करके समझौता कर लेते हैं और छूट जाते हैं तो वे अस्पृश्य जनों को हमेशा-हमेशा के लिये परेशान करते रहेंगे और अस्पृश्यता का उन्मूलन कभी नहीं होगा।

इसलिये अपराध का माफ किया जाना बहुत गम्भीर मामला है। और इस गम्भीर मामले को विशिष्ट तरीके से निपटाया जाना चाहिए। मुझे पता नहीं कि मेरे माननीय मित्र का आशय क्या है परन्तु अन्य विधियों में अन्य उपबंधों का हवाला देकर हम स्थिति को ठीक से समझ सकें तो मैं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 345 का हवाला देना चाहूँगा जिसमें लिखा है कि कौन से अपराध शमनीय हैं और कौन से शमनीय नहीं हैं। मेरे माननीय मित्र को स्मरण होगा कि भारतीय दंड संहिता में कुल मिलाकर 511 धाराएं हैं और उनमें से 106 विशुद्ध घोषणात्मक विषयों और दंड से संबंधित हैं जिनमें कानून लागू होता है, कानून के साधारण अपवाद खर्चे आदि हैं। इसलिए हम 511 में से 106 को रद्द कर देंगे या निकाल देंगे। जिन धाराओं में वास्तव में अपराध परिभाषित हैं वे कुल मिलाकर लगभग 400 हैं। भारतीय दंड संहिता में चार सौ अपराधों, कृत्यों और लोपों को अपराध बनाया गया है। इस 400 की संख्या में शमनीय अपराध कितने हैं? इस विषय पर हमको विचार करना चाहिए क्योंकि उसमें अन्तर्निहित सिद्धांत महत्वपूर्ण है। जैसा कि मैंने कहा है, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 345 में ही यह व्यवस्था दी गयी है कि कौन-से अपराध शमनीय हैं और कौन से नहीं है। मैंने कुछ हिसाब लगाया है। मैं हिसाब में कुछ कमजोर हूँ फिर भी मैं यह कहने में ज्यादा गलती नहीं कर सकता कि 400 में से केवल 44 अपराध शमनीय हैं। शेष अपराध अशमनीय हैं। इस स्थिति को देखते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि दंड विधि का सिद्धांत यह है कि सामान्य तौर पर कोई अपराध अशमनीय नहीं होगा और ये 44 अपराध सामान्य नियम के अपवाद हैं। 44 अपराधों में से 24 अपराध मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना भी शमनीय हैं और 20 दांडिक मजिस्ट्रेट की अनुमति से शमनीय हैं। अतः वास्तव में, 24 अपराध ही शमनीय हैं। अब क्या इन अपराधों को इस विधेयक में शमनीय दिखाया गया है, या नहीं? विधेयक में ऐसा कुछ नहीं लिखा है। मेरे विचार में, उसमें इस सम्बन्ध में एक स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए कि इस विधेयक के अधीन कोई भी अपराध अशमनीय होगा। यदि मेरे मित्र इस सुझाव को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं तो इसका क्या परिणाम होगा? इसका परिणाम यह होगा कि इन अपराधों में से अनेक अपराध ऐसे होंगे जो अति अथवा गम्भीर क्षति पहुंचाने वाले होंगे। उनमें केवल शक्ति का प्रदर्शन ही नहीं होगा,