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उनमें ऐसे अपराध होंगे जिनमें क्षति, गम्भीर क्षति व हिंसात्मक गतिविधियाँ शामिल होंगी। अब यदि कोई मजिस्ट्रेट धारा 345 की उपधारा (1) या (2) लागू करता है, मैं धारा 345 की 2 उपधाराओं को पढ़कर अपने माननीय मित्र को परेशान नहीं करना चाहता जिसके अंतर्गत इस प्रकार की अपराधों की परिभाषा दी गयी है-वे देखेंगे कि अपराधों में क्षति पहुंचाना भी शामिल है। वे यह भी पायेंगे कि उनमें से अधिकांश ऐसे अपराध हैं, जिनको मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना या अनुमति से शमनीय बताया गया है, परन्तु जिनको क्षति पहुंचाने, गंभीर क्षति पहुंचाने, किसी व्यक्ति को बंद रखने या उसके किसी रिश्तेदार का अपहरण करने अथवा ऐसे ही कुछ मामले अन्तर्ग्रस्त होंगे। वे सब शमनीय अपराध हैं-पूरी तरह -प्रत्येक अपराध शमनीय है। इसलिये कहने का अभिप्राय यह है कि जब तक आप इस विधेयक में कोई विशिष्ट व स्पष्ट उपबंध नहीं रखेंगे, सभी अपराध-यदि उनमें सामाजिक बहिष्कार भी है-दंड संहिता में इसका बिल्कुल कोई उल्लेख नहीं है-षड्यंत्र के अतिरिक्त यह कोई अपराध नहीं है-और ऐसा अन्य कृत्य जिन में क्षति अथवा हिंसक कार्यवाही अन्तर्ग्रस्त है, जहाँ तक धारा 345 का सम्बन्ध है, शमनीय बने रहेंगे और यह विधेयक पूरी तरह निष्प्रभावी सिद्ध होगा। यह एक दिखावा मात्र होगा। अतः मेरे माननीय मित्र इस विषय पर विचार करेंगे और सुनिश्चित करेंगे-वे निश्चय ही विधि मंत्रालय से परामर्श ले सकते हैं-क्या दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 345 की शब्दावली के अन्तर्गत ये अपराध शमनीय होंगे और यदि हाँ, तो क्या इस प्रयोजन के लिये इस विधेयक में कोई स्पष्ट उपबंध रखने की आवश्यकता नहीं है कि अस्पृश्यता से सम्बंधित मामले अशमनीय नहीं समझे जायेंगे।
अब, महोदय, मैं कुछ दोषपूर्ण उपबंधों का उल्लेख करना चाहता हूँ। मैंने कुछ भूलों का उल्लेख किया था, अब मैं दोषपूर्ण उपबंधों के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ। दंड के बारे में पहला ऐसा उपबंध खण्ड 8 हैं। विधेयक में जो दंड निर्धारित किया गया है वह 6 मास का कारावास या जुर्माना है जो 500 रुपये तक हो सकेगा या कारावास और जुर्माना दोनों दंड भी दिये जा सकते है। मेरे माननीय मित्र दंड के मामले में बहुत वाक्पटुता दिखा रहे थे। उनका कहना है कि दंड बहुत ही हलकी होना चाहिए और मुझे हैरानी हो रही थी कि कहीं वे हलकी दंड की वकालत इसलिये तो नहीं कर रहे थे क्योंकि वे स्वयं कोई ऐसा अपराध करना चाहते हैं। उन्होंने कहा ‘‘सजा हलकी’’ होनी चाहिए जिससे अपराधी के मन में कोई संताप न रहे। मेरे विचार में वे इस बात की भूमिका बना रहे थे कि अपराधी लोग जिन्होंने अस्पष्श्य जनों के विरुद्ध अपराध किया है, वे वास्तव में बहुत कृपालु सज्जन हैं, उनके मन में प्यार है और दया है और यह कार्य उनसे भूले-भटके हो गया है जो वस्तुतः माफ कर दिया जाना चाहिए। मेरे लिये यह बहुत बड़ी राहत है कि उन्होंने केवल चेतावनी देकर