अस्पश्श्यता अपराध विधेयक 1954 - Page 237

220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

छोड़ देने के दंड का प्रावधान नहीं रखा। मेरे विचार में, इसके लिये दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 561 सब से अच्छी रहती। जी, हाँ, वह सब से अच्छी रहती; यदि हमारा उद्देश्य अपराधी व्यक्ति को भी एक अच्छा व्यक्ति बनाना है; तो अच्छा यही है कि उसको चेतावनी देकर छोड़ दिया जाये। वह प्रेम का प्रसार करता रहेगा और उसके अपने मन में कोई विद्वेष नहीं रहेगा। दुर्भाग्यवश, हमारे माननीय मित्र ने सोचा कि ऐसा नहीं होना चाहिए और इसलिये दंड का सुझाव दिया है।

दंड विधान के बारे में कुछ जानकारी रखने के कारण मैं कह सकता हूँ कि जिन नियमों पर दंड व्यवस्था आधारित है, वे दो हैं। एक, अपराधी को अपना अपराध दोबारा करने से मुख्यतः रोकना है मेरे विचार में यह दंड न्यायशास्त्र का प्राथमिक नियम है। दंड आवश्यक है। नहीं तो अपराधी बार-बार अपराध करता रहेगा। उसको रोकने के लिए दंड दिया जाना आवश्यक है। दंड का दूसरा उद्देश्य यह है कि कहीं अपराधी अपराध को अपना व्यवसाय न बना ले, इस बात को रोकने के लिए भी दंड दिया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपराध करना व्यवसाय बना लेता है तो फिर उसको रोकने के लिए सख्त दंड देना पड़ेगा।

अब, महोदय यदि आप इन दोनों सिद्धान्तों को स्वीकार कर लें तो क्या इस विधेयक के प्रयोजन के लिये मेरे माननीय मित्र द्वारा प्रस्तावित दंड पर्याप्त है? पहली बात यह है कि 6 महीने का कारावास अधिकतम दंड रखा गया है और कोई मजिस्ट्रेट एक दिन के कारावास का दंड देकर भी अपराधी को छोड़ सकता है। न्यूनतम दंड निर्धारित नहीं किया गया है कि कारावास 6 महीने या तीन महीने से कम नहीं होगा या कुछ ऐसा प्रावधान नहीं किया गया है। सारी बात मजिस्ट्रेट पर छोड़ दी गई है। वह मजिस्ट्रेट कैसा होगा, यह भी संभव है और मैं कल्पना कर सकता हूँ कि मजिस्ट्रेट की कुर्सी पर न्याय करने वाला काशी का कोई पंडित होगा। इस कानून को लागू करने के मामले में उसकी अंतरात्मा क्या कहेगी? श्री बासप्पा शेट्टी (मैसूर) : काशी या कश्मीर?

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : कश्मीर के ब्राह्मण सच्चे ब्राह्मण नहीं होते। मुझे इस बात की जानकारी है कि वे मांस भी खाते हैं, मछली भी खाते हैं। जैसा कि वे कहते हैं इसलिये वे ब्राह्मण नहीं हैं।

अब जैसाकि मैंने कहा है, यदि आप चाहते हैं कि कानून का पालन हो, तो न्यूनतम दंड भी निर्धारित किया जाना चाहिए ताकि मजिस्ट्रेट उससे कम सजा न दे सके। दूसरे दंड को वैकल्पिक रखा गया है-कारावास या जुर्माना। मजिस्ट्रेट वैकल्पिक दंड के रूप में केवल जुर्माना भी लगा सकता है और ऐसे भी अपराधी हो सकते हैं जो कानून के शिकंजे से बचने के लिये 500 रुपये तक भी देने को तैयार