अस्पश्श्यता अपराध विधेयक 1954 - Page 238

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होंगे। ऐसे दंड का क्या लाभ हो सकता है? भारतीय दंड संहिता में अनेक प्रकार के दंड देने का विधान है जिनका धारा 53 में उल्लेख है-मृत्यु, देश निकाला, कारावास, संपत्ति का जब्त किया जाना, जुर्माना, कोड़े मारना, सुधारालय में नज़रबन्दी। सात अपराध ऐसे हैं जिनके लिए दंड संहिता में मृत्यु दंड का विधान है, 50 अपराधों के लिये देश निकाले के दंड का विधान है, 21 अपराधों कयसे लिये सादा कारावास का विधान है और 12 अपराधों के लिये जुर्माना लगाये जाने की व्यवस्था है। अन्य सभी मामलों में कठोर कारावास ही विधान है। मेरे माननीय मित्र ने इस विधेयक को इतना कम महत्व क्यों दिया है। इसमें पर्याप्त दंड दिये जाने की व्यवस्था क्यों नहीं की गयी। यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही। मेरा तात्पर्य यह है कि उनसे एक यह आशा तो कर सकते हैं कि वे न्यूनतम सजा का भी प्रावधान करते। चाहे वह तीन महीने का कारावास और जुर्माना ही होता यदि वह जुर्माना निर्धारित करना चाहते हैं-मैं जुर्माना लगाने के पक्ष में नहीं हूँ। यदि आप कहें कि जुर्माने की राशि पीडि़त व्यक्ति को दी जाएगी तो मैं जुर्माने का भी समर्थन कर सकता हूँ। अन्यथा मैं जुर्माना लगाने के पक्ष में नहीं हूँ।

श्री बी. बी. शर्मा (उत्तर प्रदेश) : अधिकतम अर्थात् मृत्यु दंड क्यों नहीं?

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डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यदि आप ऐसा चाहते हैं तो ठीक है, कर लीजिए- मैं इतना अत्याचारी नहीं हूँ और मेरे विचार में आप भी पूरी ईमानदारी से यह सुझाव नहीं दे रहे हैं और जैसा कि मैंने कहा, भारतीय दंड संहिता में ऐसे कोई मामले नहीं हैं जिनमें न्यूनतम दंड निर्धारित न किया गया हो। अथवा कठोर कारावास निर्धारित न किया गया हो। तीन धाराएं हैं जिनमें कठोर कारावास का दंड निर्धारित है- धारा 194, 226 और 449। फिर दंड संहिता की धारा 397 और 398 में कारावास की न्यूनतम अवधि निर्धारित है। मैं यह वही समझता कि जब पूर्वउद्धरण उपलब्ध हैं तो क्यों.... डॉ. के. एन. काटजू : 397 क्या हैं?

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : डकैती। यह डकैती से भी खराब है। मेरे विचार में किसी व्यक्ति को भूखा मारना और पानी तक न पीने देना लगभग हत्या करने के बराबर है। मेरे विचार में विधेयक में यही एक कमी है। विधेयक में, दूसरी कमी यह है कि अच्छे बर्ताव के लिये जमानत लेने का कोई प्रावधान नहीं है। दंड प्रक्रिया संहिता की चार धाराएं हैं- धारा 107, 108, 109 और 110 और वे अब अच्छे बर्ताव के लिये मजिस्ट्रेट को जमानत देने का अधिकार देती हैं। मुझे समझ नहीं आता कि इस विधेयक में इस आशय का उपबंध क्यों नहीं रखा गया। जब राजपूताना तथा अन्य राज्यों में सवर्ण हिंदू अस्पृश्य जनों को तंग करने के लिये उत्तेजना फैला रहे हैं