35. संसद निरर्हता निवारण विधेयक - Page 24

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मंत्रालय द्वारा तय किया गया शुल्क लिया था, निरर्हित नहीं होंगे। किंतु हम यह नहीं जानते कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय का निर्वचन क्या होगा। निस्संदेह डॉ. अम्बेडकर विधिवेत्ता हैं। वे संविधान की प्रारूपण समिति के अध्यक्ष थे फिर भी उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने संविधान के अनेक अनुच्छेदों का उससे भिन्न निर्वचन किया है जो उन्होंने हमें संविधान सभा में बताया था। अतः मैं इस निर्वचन को स्वीकार नहीं करता हूँ। उनके निर्वचन का हमारे लिए कोई महत्व नहीं है। उन्हें हमें अपने अनुमान नहीं देने चाहिए। यदि वे चाहते हैं कि सदस्य सदन में बने रहें, यदि वे चाहते हैं कि सदस्य चुनाव लडे़ं तो उन्हें इस बारे में ईमानदारी से यह कहना चाहिए कि इन समितियों में कार्य करने से वे निरर्हित नहीं होंगे। उनके अपने कथन के अनुसार, जो भुगतान की विहित दरों से अधिक प्राप्त करते हैं उन्हें अपने नाम निर्देशन पत्र में इसका उल्लेख करना चाहिए और तब सरकार उनके मामले पर विचार करेगी। क्या यही विचार था जब इन सदस्यों से अनुरोध किया गया था- मैं इस बात को दोहराता हूँ कि उनसे इन समितियों में कार्य करने के लिए अनुरोध किया गया था, न कि उन्हें उत्प्रेरित किया गया था। यदि उन्हें यह मालूम होता कि इन समितियों में कार्य करने से कोई निरर्हता उत्पन्न होगी तो वे उनमें कार्य नहीं करते।

माननीय उपाध्यक्ष : इस मामले में न्यायालयों की कोई अधिकारिता प्रतीत नहीं

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होती। संविधान के अधीन, मामला राष्ट्रपति को निर्दिष्ट करना होगा, जो निर्वाचन आयुक्त की सलाह से इसका विनिश्चय करेंगे।

डॉ. अम्बेडकर : मैं अपने माननीय मित्र को जानकारी देना और यह बताना चाहूँगा कि वास्तव में यह प्रश्न कैसे उत्पन्न हुआ? संसद के कुछ सदस्यों ने अध्यक्ष के समक्ष कुछ मामले रखे थे। उन्होंने कहा था कि उनकी राय में कुछ सदस्य लाभ के पद धारण किए हुए हैं। अध्यक्ष महोदय ने ही मामला राष्ट्रपति को निर्दिष्ट कियाथा और राष्ट्रपति ने ही इस मामले को नियमित बनाने के लिए हमसे कहा था। हमने अपने आप इसकी पहल नहीं की है।

श्री सिधवा : मुझे इसकी जानकारी है। किंतु मेरा तर्क भिन्न था। मैं इस तथ्य का उल्लेख कर रहा था कि माननीय मंत्री द्वारा केवल चार प्रवर्गों का उल्लेख किया गया है जबकि ऐसे अनेक सदस्य हैं जो विभिन्न समितियों में कार्य कर रहे हैं। माननीय मंत्री के अनुसार ये व्यक्ति निरर्हित नहीं होगे किंतु उच्चतम न्यायालय के अनुसार वे निरर्हित होंगे।

माननीय उपाध्यक्ष : यहाँ पर उच्चतम न्यायालय किस प्रकार आता है?

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श्री सिधवा : ठीक है, वह राष्ट्रपति है। यदि यह राष्ट्रपति द्वारा भी विनिश्चित किया जाने वाला मामला है तो भी मैं इस बारे में कोई संदिग्धता नहीं चाहता हूँ।