अस्पश्श्यता अपराध विधेयक 1954 - Page 240

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पर दंड देने के लिये बनाये जाने वाला कोई कानून संसद द्वारा बनाया जायेगा, राज्य द्वारा नहीं। यह इतने स्पष्ट शब्दों में लिखा हुआ है। इस लिये मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि संविधान में दी गयी व्यवस्था के अनुसार यह कानून केन्द्रीय सरकार द्वारा लागू किया जाएगा, न कि राज्य द्वारा। मैं यह इस लिये कहता हूँ क्योंकि मेरे माननीय मित्र कह सकते हैं कि चूंकि हमने इस अधिनियम के अधीन अपराधों को संज्ञेय अपराध बना दिया है, अतः यदि राज्य भी इस कानून को लागू करें तो उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। परन्तु अनुच्छेद 35 को देखते हुए उनका तर्क मान्य नहीं समझा जा सकता। इसलिये मैं उनको सुझाव देना चाहता हूँ कि वे इस विधेयक में एक स्पष्ट उपबंध जोड़ें कि यह कानून केन्द्रीय सरकार द्वारा लागू किया जायेगा। यदि मेरे मित्र और राज्यों का विचार यह है कि यह समवर्ती सूची में पड़ने वाला विधान है तो मैं उनका ध्यान अनुच्छेद 73 के परन्तुक की ओर दिलाना चाहूँगा, जो बहुत महत्वपूर्ण है और समवर्ती सूची में पड़ने वाले कानूनों को लागू करने से सम्बन्धित है। मेरे माननीय मित्र को स्मरण होगा कि वर्ष 1935 में भारत सरकार अधिनियम में दी गयी व्यवस्था में विषयों का इसी प्रकार वर्गीकरण किया गया था- सूची I केन्द्रीय विषय, सूची II राज्य विषय और सूची III समवर्ती विषय। परन्तु भारत सरकार अधिनियम में एक स्पष्ट प्रावधान था कि समवर्ती क्षेत्र में केन्द्र कानून बनाने की शक्ति तक ही सीमित है। वह कानून लागू करने के क्षेत्र का उल्लंघन नहीं कर सकता। भारत सरकार अधिनियम, 1935 में ऐसा उपबन्ध रखे जाने के कारण हमारे लिए इस समय बिल्कुल असंगत है। किन्तु जब हमने यह संविधान बनाया था हमने ऐसे उपबंध को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। हमने कहा था कि यद्यपि साधारणतया केन्द्र इस समवर्ती सूची में किसी कानून को राज्यों द्वारा लागू करने के लिए छोड़ सकता है फिर भी इस बात को तय करने का विकल्प केन्द्र के पास रहना चाहिए कि क्या समवर्ती सूची में शामिल कोई विशेष कानून उनके द्वारा लागू किया जायेगा, राज्यों द्वारा नहीं। अनुच्छेद 73 के परन्तुक में इस आशय को कार्यरूप दिया गया है। हमने कहा कि यदि केन्द्र यह तय कर लेता है कि समवर्ती सूची में शामिल कोई कानून केन्द्र द्वारा लागू किया जायेगा तो राज्य सरकारें उसमें कदापि हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। इस लिये मेरी पक्की राय है कि यह दलील अविधिमान्य है।

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