संविधान (चतुर्थ संशोधन) विधेयक, 1954 - Page 241

224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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संविधान (चतुर्थ संशोधन) विधेयक, 1954

* डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बंबई) : सभापति महोदय, जो व्यक्ति इंग्लैण्ड की

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संसदीय प्रणाली से परिचित हैं वे यह जानेंगे कि ब्रिटिश संविधान की कार्यविधि का एक सिद्धांत है जिसे इंग्लैंड की सभी पार्टियाँ मानती हैं। वह सिद्धांत यह है कि सम्राट कोई गलती नहीं कर सकता। यदि संविधान की कार्यविधि में कोई गलती होती है, तो गलती के जिम्मेदार प्रधानमंत्री और उसके मंत्री होते हैं। लेकिन सम्राट कभी गलत नहीं हो सकता और कभी गलती नहीं कर सकता। हमने भी इस देश में व्यावहारिक रूप से कुछ मामूली उपान्तरों के साथ इंग्लैण्ड के संविधान को अंगीकार किया है। लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे संष्विधान की कार्यप्रणाली एक सिद्धांत द्वारा संचालित होती है, जो इंग्लैंड की जनता द्वारा अपनाये गये सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है। जिस सिद्धांत पर हम अपने देश में चलते हैं वह यह है कि प्रधानमंत्री कोई गलती नहीं कर सकता है और यह कि वह कोई गलती नहीं करेगा। अतः प्रधानमंत्री जो काम करने का प्रस्ताव रखते हैं उसे सही मानकर स्वीकार करना चाहिए और उसके संबंध में कोई प्रश्न नहीं करना चाहिए। राजनीति में एक व्यक्ति के प्रति ऐसी श्रद्धा कुछ मामलों में क्षम्य हो सकती है लेकिन मुझे यह ऐसे मामलों में क्षम्य प्रतीत नहीं होती जिनमें मूल अधिकारों पर आक्रमण किया जा रहा हो। मूल अधिकार संविधान की उद्देशिका के आधार हैं। उद्देशिका कहती है कि स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व इस संविधान के आधार होंगे। संविधान के ये उद्देश्य मूल अधिकारों द्वारा कार्यान्वित किये जाते हैं। इसीलिए मुझे यह सोचना पड़ा कि मूल अधिकारों पर कोई आक्रमण किया जाये, तब प्रत्येक संसद सदस्य का यह कर्तव्य है कि वह देश के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा रखने के साथ-साथ इस का आलोचक भी बने। दुर्भाग्यवश, इस प्रकार का आलोचनात्मक दृष्टिकोण किसी में भी नहीं मिलता है। इस देश में मूल अधिकारों का इतिहास बहुत रोचक है। प्राचीन काल में हिंदू राजाओं के समय में केवल दो ब्राह्मण और गायकों ही मूल अधिकार प्राप्त थे। और पुराणों में राजा का का वर्णन ‘‘गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक’’ के रूप में किया गया है। राजा का कर्त्तव्य था : उसकी प्रजा के अन्य लोगों को उसकी ओर से न्याय मिले अथवा नहीं, अथवा ‘‘गाय’’ को छोड़कर अन्य पशुओं की ओर कोई ध्यान दिया जाए अथवा नहीं, यह बात बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं थी। जब तक ब्राह्मण और गाय की रक्षा की जाती

* संसदीय वाद-विवाद, (राज्य सभा) जिल्द- 9 ख, 19 मार्च, 1955, पृ. 2446-66