संविधान (चतुर्थ संशोधन) विधेयक, 1954 - Page 243

226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हो सकता कि इस देश का प्रशासन, न्याय, निष्पक्षता तथा सद्विवेक द्वारा चलाया जाता था। महोदय, मुझे याद है मैं कम से कम अपने प्रांत के बारे में बता रहा हूँ कि न्यायपालिका किस प्रकार स्वतंत्र थी जिसमें पूर्णतः यूरोपीय शामिल थे। यह कार्यपालिका कैसे स्वतंत्र थी, इस सम्बन्ध में मुझे एक मामला याद है........................

दीवान चमन लाल (पंजाब) : क्या यह तिलक का मामला है?

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डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह मामला बहुत प्रसिद्ध है ईस्ट इंडिया कम्पनी के समय ने बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति श्री नाइट का निर्णय बहुत लोकप्रिय था। उन्होंने बंबई सरकार के विरुद्ध एक रिट जारी की थी और बंबई सरकार ने उसे मानने से इनकार कर दिया था। बंबई सरकार ने कहा था कि बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति को कार्यपालिका के विरुद्ध कोई रिट जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। जब उन्होंने उसे यह बताया कि वे उस विशिष्ट रिट का अनुपालन नहीं करेंगे, तो श्री नाइट ने क्या किया? उन्होंने चपरासी को बुलाया और कहा, ‘‘उच्च न्यायालय की चाबियाँ लाइये’’ और उन्होंने उससे उच्च न्यायालय के प्रत्येक कमरे को बंद करने के लिए कहा जिनमें उनका अपना कमरा भी शामिल था। दूसरे दिन अपने लिए जहाज का टिकट ले लिया और यह कहते हुए लंदन वापस लौट गये।’’ ‘‘यदि आप बंबई उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति होने के नाते मेरे आदेशों का पालन नहीं करने जा रहे हैं, तो आप का उच्च न्यायालय बिल्कुल नहीं रहेगा।’’ वस्तुतः बाद में प्रिवी कांउसिल ने उसके आदेश को उलटा दिया। लेकिन वह मामला यहाँ बिल्कुल नहीं है। प्रश्न यह है कि अंग्रेजों ने इस देश पर उस ढंग से शासन किया जिसमें प्रत्येक व्यक्ति ने यह महसूस किया कि उसमें सुरक्षा की कुछ भावना है। यही कारण है। मेरे विचार से इस देश के किसी व्यक्ति ने मूल अधिकारों के लिए कोई शोर नहीं मचाया। लेकिन जैसे ही स्वराज आया प्रत्येक व्यक्ति ने सोचा अल्पसंख्यकों में से कम से कम बहुत से लोगों ने सोचा कि बहुसंख्यकों के हाथ में राजनैतिक सत्ता दिये जाने की संभावना है जिसमें उनकी संवैधानिक नैतिकता नहीं है। उनके सरकारी सिद्धांत वर्गों की असमानता थी। यद्यपि प्रत्येक समुदाय में असमानता है या कुछ भी कहें असमानता व्यावहारिक विषय है। यह एक सरकारी सिद्धांत नहीं है, बल्कि इस देश में चूंकि बहुसंख्यक लोग चतुर्वर्ण से जुड़े हुए हैं, इसलिए असमानता एक आधिकारिक सिद्धांत है। दूसरी बात यह है कि उनकी जाति व्यवस्था राजनैतिक और प्रशासनिक विभेद की तलवार है। इसका परिणाम यह निकला कि मूल अधिकार-अनिवार्य बन गये। मैंने क्या पाया-और मैं इस बात को उन लोगों की अपेक्षा अधिक जानता हूँ जो सम्भवतः कुछ करते हैं, क्योंकि मैंने इस संबंध में कुछ किया था और वह यह था कि काँग्रेस पार्टी मूल अधिकारों के संबंध में प्रफुल्लित थी। वे मूल अधिकार चाहते थे। और काँग्रेस ने सोचा कि मूल