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अधिकार इतने आवश्यक हैं कि यदि भारत के लोगों का संविधान होगा और उसमें मूल अधिकार नहीं हों तो वे दुनिया उन्हें अच्छा नहीं समझेगी। यही कारण था कि कॉंग्रेस ने मूल अधिकारों के सम्बन्ध में हल्ला बोल दिया। मैं यह जानता हूँ कि संविधान सभा की कार्यवाहियों में किसी भी सदस्य ने खड़ा होकर यह नहीं कहा ‘‘हम मूल अधिकार नहीं चाहते हैं।’’ मूल अधिकार अलंकरण के रूप में माने गये थे जो भारत के लोगों के लिए आवश्यक होने चाहिए। आज उनके दृष्टिकोण में पूर्णतः बदलाव आ रहा है। आज वे मूल अधिकारों को एक लोहे की जंजीर के रूप में देखते हैं जिसे जब कभी तोड़ने का अवसर आये, तोड़ा जाना चाहिए। मैं जानता हूँ कि यह एक मूलभूत परिवर्तन है। मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि मूल अधिकारों को मानो कि उनका कोई महत्व नहीं है। अपमान के साथ मानने का यह दृष्टिकोण ही उनको किसी भी समय बहुमत की सुविधानुसार अथवा पार्टी प्रमुख की इच्छा से बदला जा सकता है, वह दृष्टिकोण है जिससे भविष्य में कुछ भयानक परिणाम निकल सकते हैं। और मैं इसलिए बहुत दुखी महसूस करता हूँ कि यहाँ तक कि इस किस्म का मामला अर्थात् मूल अधिकारों का उल्लंघन या उनमें परिवर्तन सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा इस प्रकार माना जा रहा है मानो यह बिल्कुल भी महत्वपूर्ण बात नहीं है।
ऐसा सुझाव दिया जाना प्रतीत होता है कि जिन लोगों ने संविधान की रचना की थी उन्हें कोई अनुभव नहीं था कि मूल अधिकार लचीले होने चाहिए, उनमें प्रगतिशील परिवर्तन की पर्याप्त गुंजाइश होनी चाहिए। महोदय, मसौदा समिति का सभापति होने के नाते मुझे ऐसे किसी सुझाव को छोड़ देना चाहिए। कोई भी व्यक्ति जो मूल अधिकारों को पढ़ता है जैसे कि संविधान में अधिनियमित किये गये हैं उसे यह ज्ञात होगा कि प्रत्येक मूल अधिकार का एक अपवाद है। यह कहता है, कोई बात अंतर्विष्ट होते हुए भी राज्य उन पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। हम इस तथ्य से पूर्णतः अवगत थे कि मूल अधिकार सख्त नहीं होने चाहिए, उनमें लचीलापन होना चाहिए और हमने पर्याप्त नम्यता उपलब्ध कराई।
अनुच्छेद 31 जिसके सम्बन्ध में हम इस संशोधन विधेयक में विचार कर रहे हैं वह एक ऐसा अनुच्छेद है जिसके विषय में मैं और मसौदा समिति कुछ भी जिम्मेदारी नहीं ले सकते। उसके लिए हम कोई जिम्मेदारी नहीं लेते हैं। वह हमारा मसौदा नहीं है, परिणाम यह हुआ कि जिस समय अनुच्छेद 31 तैयार किया जा रहा था, काँग्रेस पार्टी खुद आपस में इतनी बटी हुई थी कि हम यह नहीं जानते थे कि क्या किया जाये, कौन सी बात रखी जाये और कौन-सी न रखी जाये। काँग्रेस पार्टी के तीन भाग थे। एक भाग का नेतृत्व सरकार बल्लभ भाई पटेल कर रहे थे जो पूर्ण प्रतिकर के लिए अड़े हुए थे। पूर्ण प्रतिकर का अर्थ है भूमि अर्जन अधिनियम में जो