230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चाहिए। हमने ऐसा नहीं कहा था। हमने कहा था कि ‘‘प्रतिकर’’ दिया जाये न कि ‘‘भुगतान’’ किया जाये ताकि केन्द्र और राज्य सरकारों को प्रतिकर वास्तविक रूप से भुगतान किये बगैर सम्पत्ति का अर्जन करने की छूट रहे।
हमने भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 299 और प्रविष्टि 42 के मध्य जो अन्तर किया है वह यह है कि प्रतिकर किसी भी प्रकार का हो सकता है जिसे संसद या राज्य विधानमंडल दोनों में से कोई एक या दोनों प्रतिकर को पेपर बॉंड, नकद प्रमाणपत्र या वे जिस प्रकार देना चाहे, देने के लिए कानून द्वारा निर्धारित कर सकते हैं, या यदि वे चाहे तो इसका नकद भुगतान भी कर सकते हैं। हमने यह भी कहा है कि यद्यपि संसद वास्तव में प्रतिकर निर्धारित नहीं कर सकती है। यह केवल मुआवजे के सम्बन्ध में नियम निर्धारित कर सकती है ताकि यदि कोई कानून पास किया जाता है जिसमें कोई विशिष्ट रूप से यह कहते हुए कोई खण्ड नहीं होगा कि प्रतिकर कितना होना चाहिए अपितु केवल नियम और सिद्धांत निर्धारित करना ही सम्पत्ति का कब्जा लेने और इसका अर्जन करने के लिए सरकार के लिए पर्याप्त होगा। महोदय अब मैं इस सदन के सदस्यों से पूछना चाहूँगा कि यदि वे ऐसे किसी संविधान के बारे में बता सकते हैं जिसमें सम्पत्ति अर्जित करने के सम्बन्ध में कोई ऐसी सरल प्रक्रिया है जितनी हमारे संविधान में है। क्या कोई सदस्य मुझे यह बता सकता है कि कोई दूसरा संविधान है जो सरकार को जनता के उद्देश्य के लिए सम्पत्ति अर्जित करने के लिए अधिक सुसविधाएं उपलब्ध करता है? अब इस सब सुविधा के होते हुए क्या ऐसे मामलों के सम्बन्ध में सरकार के लिए कोई प्रस्ताव लाना आवश्यक है जिसमें उसे कोई प्रतिकर नहीं देना होगा? उनको वर्तमान पीढ़ी पर पूरा बोझ डालने की आवश्यकता नहीं है। उनसे यह कहने के लिए पूछा नहीं गया है कि वे बांड जिन्हें जारी कर सकेंगे, वापस लेने योग्य होने चाहिए। वे उन्हें वापिस लेने योग्य बना सकते हैं। फिर भी उन्हें इस संबंध में यह कहने की आवश्यकता है कि बांड पर कुछ ब्याज दिया जाये जैसा कि प्रत्येक कर्जदार ऐसा करने के लिए सहमत होता है और हर ऋणदाता लेता है। यहाँ तक कि बहुत उतावले समाजवादी कैसे और यह क्यों कहें, ‘‘ठीक है, हम प्रतिकर का भुगतान नहीं करेंगे’’ मैं यह नहीं समझता हूँ। मेरी राय में तीन रास्ते हैं जिनहें माना जाना चाहिए। पहला रास्ता यह है कि पूरा प्रतिकर दिया जाना चाहिए, दूसरे के अनुसार कोई प्रतिकर नहीं दिया जाना चाहिए और तीसरे के अनुसार प्रतिकर दिया जाना चाहिए जितना कानून द्वारा निर्धारित किया जाये। मैं उन लोगों से इस सम्बन्ध में पूर्णतया सहमत हूँ जो यह सोचते हैं कि भूमि अर्जन अधिनियम की शर्तों के अनुसार पूरा प्रतिकर स्वीकार करना संभव नहीं है। मैं इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि यदि पूरे प्रतिकर से भूमि अर्जन अधिनियम के अधीन निर्धारित नियमों द्वारा निर्धारित प्रतिकर अभिप्रेत है, तो मैं सरकार का साथ देने के