संविधान (चतुर्थ संशोधन) विधेयक, 1954 - Page 250

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बहुत छोटी बात को वास्तव में दिखाने जा रहा हूँ, इसकी लाश बिना रोये, और बिना गीत गाये ले जानी चाहिए और इसके ऊपर किसी व्यक्ति को चिल्लाना नहीं चाहिए। मैं इसके ऊपर चिल्लाने नहीं जा रहा हूँ क्योंकि इससे कुछ अच्छा नहीं होने वाला है या इससे किसी को कोई नुकसान नहीं होने वाला, जैसाकि मैं दिखाऊंगा। इसलिए मेरा सरकार को यह सुझाव था कि इन मूल अधिकारों का समय-समय पर अतिक्रमण करने की अपेक्षा, यह बहुत अच्छा है कि संसद को प्रतिकर निर्धारित करने के लिए हमेशा के लिए शक्ति प्रदान की जाये। संविधान में समय-समय पर काट-छांट करना बुरी बात है। मैंने ऐसा पिछली बार कहा था लेकिन मैं नहीं समझता हूँ कि सरकार ने इस ओर कोई ध्यान दिया है। मैं फिर उसी चेतावनी को दोहराना चाहूँगा और मैं कुछ कारण बताना चाहूँगा कि संविधान में इतनी आसानी से संशोधन और उसमें रद्दोबदल क्यों किया जाये। कोई भी व्यक्ति जो, सभाओं के कानूनों की व्याख्या करने में संदर्भ है और सांविधिक नियमों की व्याख्या करने के लिए निर्धारित नियम हैं वे यह याद दिलायेंगे कि व्याख्या करने के प्रसिद्ध नियम हैं जिसे आश्चर्य चकित निर्शाभद (स्टेअर डेसीसिस) कहते हैं और उसका अर्थ यह है कि जब सभाओं ने बहुत ही एक रूप भावना से बहुत वर्षों के लिए कोई व्याख्या दी है और बहुत वर्षों के पश्चात् कोई विधिवक्ता आगे आता है सभा को यह सहमत कर देता है कि वर्तमान व्याख्या गलत है और इसमें परिवर्तन होना चाहिए सभा कहती है कि वे ऐसा नहीं करेंगे यद्यपि वे इसके लिए सहमत है कि व्याख्या गलत है। न्यायालयों ने निर्णीतानुसरण सिद्धांत को क्यों अपना लिया है वह बहुत महत्वपूर्ण है। कोर्ट कहता हैः-

‘‘हमने जो कुछ भी सही या गलत व्याख्या की है, वह अब महत्वपूर्ण बात नहीं है। इसका एक मामूली सा कारण यह है कि बहुत से लोगों ने हमारी व्याख्या के अनुसार सदैव ही सही कानून होने के नाते कार्य किया है, उत्तरदायित्व निभाना है, अधिकारों को प्राप्त किया है। अब यह कहें कि ये सभी उत्तरदायित्व और अधिकार गलती से प्राप्त किये गए हैं। इससे समाज में बिखराव आ जायेगा। इसलिए गलती को ही जारी रहने दिया जाये।’’

यह दृष्टिकोण न्यायालयों ने अपनाया है। मेरे विचार में भी इसी कारण से, संविधान में निरन्तर संशोधन क्यों नहीं किया जाना चाहिए। लोग यह जानते हैं कि संविधान में कुछ नियम, बाध्यताएं अन्तर्विष्ट हैं और उनके अनुसार लोग अपनी संविदाएं करते हैं वे भविष्य के लिए अपनी योजनाएं बनाते हैं। इसलिए प्रति वर्ष इन मूल्यों में गड़बड़ करना ठीक नहीं है। यही कारण है कि मैं यह कहता हूँ कि संविधान में इतनी आसानी से और बार-बार संशोधन नहीं किये जाने चाहिए। मैं यह नहीं जानता हूँ कि क्या सरकार इस बात को सुनेगी, कदाचित नहीं।