संविधान (चतुर्थ संशोधन) विधेयक, 1954 - Page 251

234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय श्री ताजमुल हुसैन (बिहार) : वे क्यों सुने?

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : ठीक है, महोदय, यह एक आदत है। जब किसी गाय को किसी दूसरे व्यक्ति के खेत में घुसने की आदत हो जाती है, आप नैतिकता से उसकी आदत को बदल नहीं सकते हैं। यह आदत है।

माननीय उपसभापित : बोलते जाइए, बोलते जाइए।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : दूसरे देशों में जब कभी संविधान के किसी खण्ड की न्यायपालिका द्वारा उस ढंग से व्याख्या की जाती है। जिसे सरकार नहीं चाहती है तो सरकार सहमति दे देती है, सरकार न्यायालय के निर्णय को उलटना नहीं चाहती है। अपने देश में हमने एक अलग मनोवृत्ति पैदा कर दी है। हमारी मनोवृत्ति ऐसी है कि यदि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश हमारी पसंद का निर्णय नहीं देते हैं तो इस निर्णय को बाहर फेंक सकते हैं। यहाँ ऐसा है। मुझे उच्चतम न्यायालय के व्यवहार से तो कुछ खुशी है। थोड़े समय में ही जब यह अस्तित्व में आया है, मैं उच्चतम न्यायालय के कुछ अलग-अलग चरण देखता हूँ। बीमार होने के कारण पिछले दो या तीन वर्षों से मैं उच्चतम न्यायालय में नहीं जा रहा हूँ, लेकिन मैं उस से संपर्क बनाये रख रहा हूँ जो कुछ न्यायालय में हो रहा है। मुझे याद है कि उच्चतम न्यायालय ने अपनी शक्तियों के अनुसार सबसे पहले यह घोषणा की या घोषणा करने का साहस किया कि भारतीय दंड संहिता की कुछ धारा शक्तिबाह्य है। हमारी सरकार ने एकदम प्रतिक्रिया की और यह घोषणा करने के लिए एक संशोधन लायी कि उच्चतम न्यायालय की व्याख्या गलत है।

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माननीय सभापति : हमें उच्चतम न्यायालय पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं आशा करता हूँ कि उन अनवरत संशोधनों के होते हुए भी जिनकी सरकार लाने की इच्छुक प्रतीत होती है, इस बात के बावजूद कि सरकार क्या कह सकती है, उच्चतम न्यायालय अपना स्वतंत्र निर्णय देना जारी रखेगा। मुझे नहीं लगता कि उच्चतम न्यायालयों ने कोई ऐसा निर्णय दिया है जिसके बारे में कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि यह इस संविधान के शब्दों के अनुरूप नहीं है।

महोदय, अब मैं विधेयक के विभिन्न खण्डों पर विचार करूंगा। पहला खण्ड खण्ड-2 है। विधेयक का यह खण्ड-2 मूल अनुच्छेद 31 के खण्ड (2) को दो भागों में विभाजित करता है। वे भाग हैं खण्ड (2) और खण्ड (2क)। खण्ड (2) के सम्बन्ध में किसी ने