238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के सिद्धांत के अनुसार होने चाहिए। यदि वे ऐसे हैं तो उनको कोई आपत्ति नहीं है।
अब दूसरे विधान खण्ड (क) पर आते हैं। इस संबंध मुझे कोई आपत्ति नहीं है। यह इसी रूप में रह सकता है।
खण्ड (ख) के संबंध में मैं यह नहीं जानता हूँ कि क्या (ख) का पहला भाग खण्ड (क) से भिन्न हैं। मुझे ऐसा लगता है कि दोनों एक जैसे हैं लेकिन मैं इस संबंध में कुछ स्पष्टीकरण चाहूँगा कि ‘‘कृषि जोतों में किन्हीं अधिकारों में उपान्तरण’’ से क्या अभिप्राय है। उसका क्या अभिप्राय है? इस सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण नहीं है। जहाँ तक मैं समझता हूँ किसान को चार अधिकारों की आवश्यकता है। पहला, काश्तकारी की सुरक्षा, जमींदार द्वारा बिना किसी उचित कारण के बेदखल नहीं किया जाना। दूसरा वह उस उचित लगान का भुगतान देने का दायी होना चाहिए जो, यदि आवश्यक हो तो न्यायालय द्वारा निर्धारित किया जाए। तीसरा उसे कृषिजोतों को अंतरित करने का अधिकार होना चाहिए। यदि वह अपनी कृषिजोत बेचना चाहता है तो उसे बेचने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और भूस्वामी को उसके रास्ते में नहीं आना चाहिए। और चौथा यह वंशानुगत होनी चाहिए। इस संबंध में यह कहना है कि यदि वह मर जाता है तो उसके आश्रितों को जमीन पर दावा करने का अधिकार होना चाहिए। अब ये चार बातें हैं जो मेरे विचार से कृषि भूमि के काश्तकार के हित में है। मैं यह नहीं जानता हूँ कि संशोधन का स्वरूप क्या है और वे कौन से अधिकार हैं जिनमें वे संशोधन करना चाहते हैं। मेरे विचार से इस संबंध में कुछ स्पष्टीकरण आवश्यक है।
इसके बाद उपखण्ड (ग) पर आता हूँ जो कृषि भूमि की अधिकतम सीमा निर्धारित करने से सम्बन्धित है। ठीक है जो कुछ मैं कह सकता हूँ वह यह है कि क्या इस विशिष्ट खण्ड का कोई वास्तविक परिणाम निकलेगा, जो इस बात पर निर्भर करता है कि वह अधिकतम सीमा क्या है जो आप निर्धारित करने जा रहे हैं। यह समाजवादी पार्टी का एक निश्चित विचार है। वे चाहते हैं कि काश्तकार को भूमि की अधिकतम जोते निर्धारित करने के पश्चात् भूमि का वितरण किया जाना चाहिए।
माननीय उपसभापति : क्या इन मामलों को संयुक्त समिति की बैठक में उस
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समय नहीं लिया जाना है, जब वह मामले को चर्चा के लिए लेगी?
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : हो सकता है लेकिन प्रश्न यह है कि यह जानना
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आवश्यक है कि क्या ये बातें वास्तव में संविधान में शामिल किये जाने के लिए अच्छी हैं। मेरे मित्र श्री पंत जानते हैं क्योंकि वे उत्तर प्रदेश में भूधृतियों विषयक समिति के अध्यक्ष थे जिसके बारे में मैंने यह पढ़ा है कि उत्तर प्रदेश में भूमि की अधिकतम सीमा ‘‘रैयत’’ के लिए लगभग दो एकड़ हैं और मुझे यह पता नहीं है कि भारत के किसी अन्य भाग में जहाँ रैयतवाड़ी विद्यमान है वहाँ जोत दो एकड़ से ज्यादा है। मैं