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राज्य पुनर्गठन विधेयक, 1956
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* डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बंबई) : उपसभापति महोदय, इस विधेयक के सम्बन्ध
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में वाद-विवाद के हंगामे का केन्द्र बिन्दु जैसा कि मुझे समाचार-पत्रों से पता चलता है, बंबई शहर को दी गई स्थिति है। जैसाकि विधेयक से स्पष्ट है, यह शहर जो इस देश के नागरिक मामलों में प्रमुख शहर था इसके स्तर को घटाकर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के स्तर का कर दिया हैं जो हमारे संविधान में भारत के संघ राज्यक्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है। उसका अभिप्राय यह है कि इन संघ राज्य क्षेत्र और अब बंबई शहर के लिए कोई विधानमंडल या कार्यपालिका नहीं होगी। कोई भी व्यक्ति अपने विशाल सपनों में भी इस प्रकार के पागलपन की बात नहीं सोच सकता। जो शहर भारत का प्रमुख शहर रखा है, जिससे भारत ने राजनीति सीखी हो, अब उसका स्तर लक्षद्वीप और मालद्वीप तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जैसा बना दिया है मुझे भरोसा है कि जिस सरकार ने इस प्रस्ताव को प्रोत्साहन दिया है उसके सम्बन्ध में उसके पास उस निर्णय को लेने के पक्के तथा अकाट्य कारण होंगे। बंबई शहर के लिए दावा करने के लिए संघर्ष रहा है। महाराष्ट्रियनों ने यह दावा किया है कि बम्बई शहर उनका है। हमारे गुजराती भाई भी हैं, मैं यह नहीं जानता हूँ कि वे किस आधार पर अपना दावा करते हैं लेकिन वे इस शहर पर सुविधा के आधार पर दावा करते हैं। वे कहते हैं कि वे शहर को महाराष्ट्रियनों के कब्जे में जाने की अनुमति नहीं देंगे और इसके लिए झगड़ा चल रहा है। श्री मोरारजी देसाई ने यह स्वीकार कर लिया है कि बंबई महाराष्ट्र का है। मैंने उनके भाषण को पढ़ा है जो उन्होंने गुजरात महाप्रदेश कांग्रेस में दिया था। और भी ऐसी बातें हैं जिन्हें उन्होंने स्पष्ट रूप से अपने वक्तव्य में कहा था कि बंबई महाराष्ट्र का है। यदि ऐसा है तो मैं यह समझने में बिल्कुल असमर्थ हूँ कि बम्बई को महाराष्ट्र को दिये जाने में क्या आपत्ति हो सकती है। ब्रिटिश शासनकाल में जब नागरिकता एक समान थी कोई भी व्यक्ति कहीं भी जा सकता था और रह सकता था। तथा स्थानीय लोगों को कोई आपत्ति नहीं थी। उन परिस्थितियों में विभिन्न प्रान्तों के विभिन्न लोग अन्य प्रान्तों के शहरों में गये उन्होंने वहाँ अपनी दिलचस्पी पैदा की और वहीं पीढि़यों तक रहे। लेकिन जो पुनर्विभाजन हम कर रहे हैं उससे मैंने मद्रास में कोई गैर-मद्रासी
* संसदीय वाद-विवाद, (राज्य सभा) खण्ड, 12-क-1956, 1 मई, 1956, पृ. 834-46