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से सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा। अब यह विधेयक लगभग पांच महीने पहले पिछले सत्र के दौरान पारित कर दिया जाना चाहिए था। मुझे खुशी है कि कम से कम अब इसे पहले स्थान पर रखा गया है यह इतना आसान कदम नहीं है जैसा कि डॉ. अम्बेडकर मानते हैं। मेरा उनसे निवेदन है कि सरकार का आशय सुस्पष्ट है। वे यह नहीं चाहते कि कोई भी अपने किसी दोष के न होते हुए भी अप्रन्नता या निरर्हता का भागी बने। यदि ऐसा है तो विधेयक में ही इसे बिल्कुल स्पष्ट किया जाए। स्वयं डॉ. अम्बेडकर के कथन से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि कुछ सदस्य स्वतः निरर्हित समझे जाएंगे यदि कोई मामला राष्ट्रपति के पास ले जाया गया, जो निश्चित रूप से विधि मंत्रालय के कहने पर विधि का निर्वचन करेंगे। राष्ट्रपति स्वाभाविक रूप से डॉ. अम्बेडकर से सलाह लेंगे और मुझे विश्वास है कि वे उस निर्वचन में भिन्न निर्वाचन नहीं करेंगे जो उन्होंने अब किया है।
अपने भाषण के दौरान डॉ. अम्बेडकर ने मेरे संशोधन को निर्दिष्ट नहीं किया था-संभवतः उन्होंने इसे न देखा हो। आप देखेंगे कि मैंने, अपने संशोधन में पच्चीस समितियों के नाम दिए हैं जिनमें सदस्यों ने कार्य किया है। मुझे इसकी जानकारी नहीं है कि क्या कुछ सदस्यों ने वित्त मंत्रालय द्वारा घोषित शुल्कों से अधिक शुल्क प्राप्त किया है। किसी भी हालत में, मैं डॉ. अम्बेडकर के निर्वचन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ जबकि संविधान का निर्वाचन करने के लिए उच्चतर प्राधिकरण हैं।
* श्री करुणाकर मेनन (मद्रास) : ऐसी कुछ समितियाँ है जो मंत्रियों द्वारा नहीं
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बनाई गईं बल्कि सरकार द्वारा बनाई गई हैं। उदाहरणार्थ केंद्रीय सुपारी समिति जो सरकार द्वारा गठित समिति है। उस समिति के सदस्य नाम निर्देशित किए जाते हैं जिनमें से कुछ सदस्य संसद सदस्य भी हैं। उस समिति के बारे में क्या किया जाना है?
पंडित ठाकुर दास भार्गव : इसी प्रकार की एक समिति में मैं स्वयं भी था- भारतीय केंद्रीय कपास समिति। किंतु यहाँ शब्दावली इस प्रकार है ‘‘जो भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करता है’’। ये सब डॉ. अम्बेडकर के निर्वचन के अंतर्गत आते हैं कि- लाभ का पद क्या है। यदि आप सहमत भी नहीं होते तब भी यह संदेहास्पद बात है, जैसा कि उद्देश्य और कारणों के कथन में कहा गया था। मैं इस बात को निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि ऐसी सदस्यता लाभ का पद नहीं है और इसीलिए यह निश्चय ही संदेहास्पद है। अब हमारे नए संसदीय सचिवों का क्या होगा?
* संसदीय वाद-विवाद खड-14, भाग- II, 7 अगस्त, 1951, पृ. 57-71